गुरुवार, 6 नवंबर 2008

सपना

आखो मे अब न कोई सपना
दिल मे न कोई अपना
दर्द का अब अह्शाश नही
खुशी की कोई मुस्कराहट नही
जीने की कोई इछा ही नही
क्यो जी रहा हु पता ही नही

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