रविवार, 16 नवंबर 2008

दास्ता प्यार की

ये तुमने मुझ पर क्या इल्जाम लगा दिया ,
मेरे दिल की दास्ता - ऐ - प्यार को मुजरिम बना दिया ,
जाओ अब तुम्हे खयालो मे भी कुछ न कहेगे ,
दिल अगर कभी न माना ,
उसे चीर दिया करेगे......................

6 टिप्‍पणियां:

  1. बढीया कविता है। :)

    ईस गम को मार डालो
    और आप भी एक
    ब्लाग बना डालो

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  2. गम को जरूर मारुगा,
    पर गम देने वाली को हर वक्त याद करूगा जानी..................

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  3. जाओ अब तुम्हे खयालो मे भी कुछ न कहेगे ,
    दिल अगर कभी न माना ,
    उसे चीर दिया करेगे......................
    खूब लिखा है आपने. दिल के दर्द को ब्लॉग पर उतारने का अच्छा प्रयास है आपका. शुभकामनाएं और स्वागत मेरे ब्लॉग पर भी.

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  4. Apnee sadgeeke karan sundar banee hai ye rachna..Swagat hai aapka yahan....shubhkamnayon sahit !Mere blogpe aaneka snehil nimantranbhee...

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  5. ब्लोगिंग जगत में आपका स्वागत है. खूब लिखें, खूब पढ़ें, स्वच्छ समाज का रूप धरें, बुराई को मिटायें, अच्छाई जगत को सिखाएं...खूब लिखें-लिखायें...
    ---
    आप मेरे ब्लॉग पर सादर आमंत्रित हैं.
    ---
    अमित के. सागर
    (उल्टा तीर)

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  6. आपने बहुत अच्छा लिखा है ।
    भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
    लिखते रहि‌ए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
    कविता,गज़ल और शेर के लि‌ए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
    मेरे द्वारा संपादित पत्रिका देखें
    www.zindagilive08.blogspot.com
    आर्ट के लि‌ए देखें
    www.chitrasansar.blogspot.com

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