शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008

बाग़ मे एक फूल खिला था ,
न जाने किस ने तोड़ दिया ,
तुम भी न जाने कैसी इतनी बेवफा हो गई ,
की हम से मिलना छोड़ दिया ******

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें