शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

दाग की शायरी -1

लुत्फ़ वो इश्क में पाये हैं के जी जानता है
iरंज भी इतने उठाये हैं के जी जानता है
जो ज़माने के सितम हैं वो ज़माना जाने
तुने दिल इतने दुखाये हैं के जी जानता है
तुम नहीं जानते अब तक ये तुम्हारे अंदाज़
वो मेरे दिल में समाये हैं के जी जानता है
इन्ही क़दमों ने
तुम्हारे इन्ही क़दमो की क़सम
ख़ाक में इतने मिलाये हैं के जी जानता है
दोस्ती में तेरी दर पर्दा
हमारे दुश्मन इस कदर अपने पराये हैं के जी जानता है

1 टिप्पणी: