मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009

पुलिस

पुलिस के प्रति एक विशेष श्रद्धा मिश्रित कौतूहल भाव मेरे मन में सदा बना रहा। यों भारतीय पुलिस के विषय में इतनी रोचक सूचनाएँ आए दिन प्राप्त होती रहती हैं कि किसी और मनोरंजन की आवश्यकता ही नहीं है। पुलिस को मानवीय और सभ्य बनाने की कोशिशें लगातार जारी हैं। लेकिन अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर वाला प्रभाव‚ छूटे तब ना। पुलिस के विषय में हमें अपनी मध्ययुगीन मानसिकता भी बदलनी होगी। हमारे पुलिस जन को भी अपनी‚ थुलथुल काया‚ रोबदार चेहरा‚ घनी मूँछों से छुटकारा पाना होगा। फिल्मों का इस क्षेत्र में योगदान सराहनीय है। उन्होंने पुलिस जन के कई संस्करण भारतीय जनता के सम्मुख रखे हैं। हास्यास्पद से लेकर चाकलेटी तक और खलनायक से लेकर ठेठ लंपट प्रेमी तक। चयन आपका अधिकार है। क्रोध की माया ही ऐसी मतमंद होती है वत्स! एक दिवस हमने पार्क में एक पुलिस वाले को अपनी मंगेतर से नम्र निवेदन करते हुए सुना– ''ए. . . इधर आय ससुरी। वहन का कूं कूं. . .कर रही है'' श्रृंगार का ऐसा सघन? रूप देख मन रोमांचित हो उठा। लगता है शिशुपाल इनके पूर्वज रहे होंगे। उन्होंने सौ गालियाँ तक का विश्व रिकॉर्ड बनाया था। इनका पता नहीं, एक थानेदार मित्र ने मुझसे गंभीर होते हुए कहा– ''यार कहीं इस विचार के जनक का पता मिलें तो बताना‚ स्साले को ऐसा फिट करूँगा कि सब भूल जाएगा। अधिकारों की देखरेख हमारी ज़िम्मेदारी है या जनता की।'' स्त्रियों के विषय में सामंती संस्कार भला कहाँ छूट पाए हैं ''जेहि की बिटिया सुंदर देखी तेहि पर जाय धरे हथियार'' वाला अंदाज़ बरकरार है। इन सब ख़बरों को पढ़कर मैं पुलिस के प्रति अपार भक्ति एवं श्रद्धा भाव से भर जाता हूँ। मैं जो कभी अपने बच्चों को ढंग से गाली नहीं दे पाया‚ व्यवस्था को गाली नहीं दे पाया वह भला पुलिस मैं क्या ख़ाक भर्ती होता? क्योंकि न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता के बिना कैसे काम चलता? आप पुलिसयाने की सोच रहें है क्या? हाँ हाँ तो गरियाना चालू कर दें। ठीक बिल्कुल ठीक. . .पहले घर से ही शुरू करें। माँ–बाप से शुरू करें तो और भी अच्छा।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें