गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

दर्द दिल का -2

हमें तो शामे-ग़म में काटनी है ज़िन्दगी अपनी
जहाँ वो हों वहीं ऎ चाँद ले जा चाँदनी अपनी

अगर कुछ थी तो बस ये थी तमन्ना आख़री अपनी
के वो साहिल पे होते और कश्ती डूबती अपनी

जो वो अपने हुए तो सारी दुनिया हो गई अपनी
चमन के फूल अपने, चाँद अपना, चाँदनी अपनी

ख़ुदा के वासते ज़ालिम घड़ी भर के लिए आजा
बुझानी है तेरे दामन से शम्मे-ज़िन्दगी अपनी

वहीं चलिए, वहीं चलिए तक़ाज़ा है मोहब्बत का
वो मेहफ़िल हाय! जिस मेहफ़िल में दुनिया लुट गई अपनी

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें