शुक्रवार, 5 जून 2009

गजल -1

रात बीती नींद क्यूँ आयी नहीं
एक पल भी आँख झपकाई नहीं

करवटें लेना गवारा था उन्हें
बिस्तरों को पीठ दिखलाई नहीं

खुदकशी का ये इरादा छोड़ दे
प्यार का अंजाम रुसवाई नहीं

तू हमारी जान की भी जान है
इसलिए तेरी कसम खाई नहीं

वो सियासी खेल का उस्ताद है
वो किसी का दोस्त या भाई नहीं

कौन सी तालीम लेकर आये हो
बिन लड़े एक बात सुलझाई नहीं

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