मंगलवार, 16 जून 2009

अमित की शायरी -4

लो राज़ की बात आज एक बताते हैं
हम हसकर अपने गम छुपाते हैं ,

तनहा होते हैं तो रो लेते जी भर कर
सर -ऐ -महफ़िल आदतन मुस्कुराते हैं .

कोई और होंगे रुतबे के आगे झुकने वाले
हम सर बस उस के दर पर झुकाते हैं

माँ आज फिर तेरे आँचल में मुझे सोना है
आजा बड़ी हसरत से देख तुझे बुलाते हैं .

इसे जिद समझो या हमारा शोक -ओ -हुनर
चिराग हम तेज़ हवायों में ही जलाते है

तुमने महल - 0 -मीनार ,दौलत कमाई हो बेशक
पर गैर भी प्यार से मुझको गले लगाते हैं

शराफत हमेशा नज़र झुका कर चलती हैं
हम निगाह मिलाते हैं नज़रे नही मिलाते हैं

ये मुझ पर ऊपर वाले की इनायत हैं
वो ख़ुद मिट जाते जो मुझ पे नज़र उठाते हैं

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