मंगलवार, 30 जून 2009

एक कहानी - मुर्दे का तोहफा

आज चाहे हमारे देश में दुनिया का एक से एक बढिया सामान बन रहा है, लेकिन न जाने अधिकतर लोगों के मन को अभी भी विदेशी चीजें क्यूं बहुत भाती है | कुछ लोग तो इन विदेशी चीजों के दिवाने होते है | कोई भी परिवार का सदस्य या रिश्तेदार जब कभी भी विदेश से आ रहा हो तो हर आदमी एक लंबी चोडी सामान मंगवाने की लिस्ट तैयार रहती है | फिर चाहे वो भारत की बनी हुई ही वस्तु वहां से खरीद कर ले आये ? अगर कोई रिश्तेदार अचानक विदेश से आया है, तो हर आदमी को यह आस रहती है, कि विदेश से उनके लिये कुछ न कुछ तोहफा लेकर जरुर आया होगा |

अगर देखा जाए तो जीवन में तोहफे किसे अच्छे नहीं लगते ? हर खुशी के मौके पर हम सब न सिर्फ दोस्तों-यारों को बल्कि रिश्तेदारों को अक्सर तोहफे देते और लेते रहते है | बच्चों को तो जन्मदिन के तोहफों का सारा दिन इन्तजार रहता है | कुछ दिन पहले सुबह-सुबह हमारे वीरु साहब और उनके कुछ रिश्तेदार पंजाब से दिल्ली आये, तो पूछने पर उन्होने बताया कि हमारी दादी जो छोटे भाई के पास कनडा गई हुई थी | उनका वहीं देहान्त हो गया है | आज हवाई जहाज से उनका पार्थिव शरीर आ रहा है | हम सब उसी को लेने के लिये आये है | बर्जुगों के प्रति आदर और स्नेह देख कर बहुत अच्छा लगा कि इन सबको अपने बर्जुगों से कितना प्यार है जो सब कामकाज छोडकर पुरा परिवार पंजाब से यहां दिल्ली दादी के पार्थिव शरीर को लेने आये है |

हवाई अड्डे पर कुछ कागजी कार्यवाई करने के बाद जब दादी के मृत शरीर का कफन घर लेकर आये तो सारा परिवार इक्ट्ठा हो गया | मुंह दिखाई के लिये कनाडा से आये मृत शारीर के कफन का जब ढक्कन खोलने की कोशिश शुरु की तो वो सब तरफ से बहुत ही मजबूती से पैक किया हुआ था | बक्से के किसी भी कोने में कोई जगह खाली नहीं छोडी गई थी | सबसे ऊपर एक चिठ्ठी रखी हुई थी जिस पर वीरु भाई साहब का नाम लिखा था | उस छिठ्ठी का विषय कुछ इस प्रकार से था |

प्रिय वीरु भाई साहब एवं बंसती भाभीजी को नमस्कार | दादी जी के अचानक गुजर जाने का बहुत ही अफसोस है | मैं दादी जी का मृत शरीर भेज रहा हूँ | उनकी आखरी इच्छा थी कि उनका अन्तिम संस्कार पंजाब में उनके पैतृक गांव में ही किया जाये | मैं खुद भी साथ आना चाहता था, लेकिन मेरी सारी छुटियां इनके इलाज में पहले ही खत्म हो गई हैं | अब सिर्फ तनख्वाह के बिना ही छुट्टी मिल सकती थी, वो मेरी बीवी ने लेने से मना कर दिया है |

दादी के कफन में उनके शरीर के नीचे बच्चों के लिये काफी सारी मंहगी वाली चाकलेट, वैफर और बिस्कुट रखे है | कुछ बादाम और काजू के पैकट भी दादी के दांये बाजू के नीचे छिपा कर रखे हुए हैं | दादी के पैरों में एक स्पोर्टस जूते डाले हुए है, वो निकाल कर बंटी को दे देना, उसने इसके लिये कई बार मुझे फोन किया था | दादी पैरों में अलग-अलग रंग और डिजाइन की एक दर्जन जुराबें डाली हुई है, वो आप सब मिल कर बांट लेना | उम्मीद है कि आपको डिजाईन और रंग पसन्द आयेंगे और साईज भी पूरा होगा |

हमने दादी को अलग-अलग डिजाईन की छह टी-शर्ट भी पहना दी थी बडा साईज बंटी के लिये छोटा बबली और चिटूं को दे देना | पिता जी के लिये एक मंहगी घडी भी दादी के दांये हाथ पर थोडा ऊपर बांधी है | उसे भी संभाल कर उतार लेना | बुआ जी और चाची जी के लिये सोने का बना हुआ एक-एक गले का हार और कुछ अंगूठियां भी दादी के हाथों की अगुलियों और गले में हार लगा हुआ है | यह सब भी उन्हें ठीक से पंहुचा देना |

कफन के निचले हिस्से में कुछ गर्म सूट के कपडे रखे है वो आप सर्दियों में सिलवा लेना | भाई साहब आपके लिये मैंने दो बढिया वाली जीन्स भी दादी को पहना कर भेजी है | वो भी आप अंतिम संस्कार से पहले ठीक से उतार लेना | अगर इस सब के अलावा किसी और सामान की जरुरत हो तो जल्दी पत्र भेज देना क्योंकि दादा जी की भी तबीयत ठीक नहीं रहती | मुझे नहीं लगता कि वो ज्यादा दिन तक चल पाएगें | बाकी सारा सामान उनके कफन के साथ भेज दूगां |


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें