गुरुवार, 2 जुलाई 2009

दर्द दिल का -7

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ, फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
पहले से मेलजोल न सही, फिर भी कभी तो
रस्मो-रहे-दुनिया ही निभाने के लिए आ
किस-किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ
अब तक दिले को हैं तुझसे उमीदें
ये आख़िरी शम्ऐं भी बुझाने के लिए आ
इक उम्र से हूँ आसुओ के स्वाद से भी महरूम
ऐ राहते-जां मुझको रुलाने के लिए आ
कुछ तो मेरे मुहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ
माना कि मुहब्बत का छुपाना है मुहब्बत
चुपके से किसी रोज़ जताने के लिए आ
जैसे तुम्हें आते हैं न आने के बहाने
ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ

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