गुरुवार, 2 जुलाई 2009

दूसरी कहानी - अप्रैल फूल

''प्लीस सर, मेरी बात का विश्वास करीए आप का बेटा मर चूका है। में आपको अप्रैल फुल नहीं बना रहाँ। में सच कह रहाँ हु आखिर आप मेरी बात का विश्वास क्यों नहीं करते।''

वह कोन्स्टेबल आखिर तक यही कहता रहाँ लेकिन उस पिता को इस बात का बिलकुल भी भरोसा नहीं हुआ कि वाकैहि में यह कोन्स्टेबल सहीं बोल रहाँ था।

1- अप्रैल की सुबह से हीं सुनिल के घर में सभी लोग एक-दूसरो को अप्रैल फुल बना रहे थे। सुनिल को एक बूरी आदत थी वह हमेशा 1-अप्रैल के दिन अपने परिवारजनो और दोस्तो को अप्रैल फुल बनाता था।

आज 1 अप्रैल का दिन था। सुबह से ही उसके घर में लोगो को बेवकूफ बनाने का सिलसिला शुरु हो गया था। अपने घर के सभ्यो को बेवकूफ बनाने के बाद सुनिल अपनी मोटरसाईकल पर काम पर चला गया लेकिन रास्ते में एक बस से टकराने के कारण उसकी मृत्यु हो गई।


सुबह 9 बजे सुनिल के परिवार को एक पुलीस कोन्स्टेबल ने फॉन किया कि उनके बेटा की मार्ग अकस्मात में मृत्यु हो चूँकी है। लेकिन सुनिल के पिताजी सुशिल उस बात को महज एक मजाक मानते रहे और उन्होने हँसते हँसते यह फॉन काट दिया।

सुशिल ने फिर भी इस बात की पुष्टि करने के लिए सुनिल का मोबाईल फॉन लगाया। लेकिन नंबर बंद था। अपने बेटे की आदतो से परिचित पिता ने फिर सोचा कि उस का बेटा शायद फॉन बंद रखके सब को अप्रैल फुल बनाना चाहता है।

फिर भी एक पिता को अपने बेटे की चिंता थी। उन्होने सुनिल जहाँ पर काम कर रहा था वहाँ फॉन लगाया। सामने से सिर्फ एक ही जवाब आया कि ''सुनील तो अब तक काम पर ही नहीँ आया।''

अब सुशिल थोडे चिंतित हो गए उन्होने बारी-बारी करके सुनिल के सारे दोस्तो को फॉन लगा ड़ाले, लेकिन कहीं भी सुनिल का कोई पता नहीँ चला।

करीबन सुबह 9:30 बजे सुशिल के घर में एक फॉन रींग बजी। सामने से आवाज आई '' हेलो में रेबल पुलिस स्टेशन का सब इन्स्प्केटर जे डी कदम बोल रहा हुँ। आपके पुत्र की एक ट्रांसपोर्ट बस के साथ टकरा जाने से मृत्युं हो गई है आप फौरन पुलिस स्टेशन' आ जाए।''

यह खबर सुनकर सुशिल का लहू मानो ठंड़ा गया। वह फौरन पुलिस स्टेशन पहुंचे। फिर क्याँ होना था पूरा पुलिस स्टेशन एक पिता की करुण आक्रंदन से गुँज उठा।

यह पिता रोते रोते सिर्फ एक ही बात बोल रहाँ था '' सुनिल आज तुने मुझे क्यो अप्रैल फुल नहीँ बनाया....काश यह खबर एक मजाक होती।''

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