गुरुवार, 16 जुलाई 2009

भटकते मन की भटकती कविता

हर दिन,
हर पल,
निराशाओं का शून्य
निगल जाता है
मेरी आशा का
इक और सूरज!
और व्यथित सा मेरा मन
उद्विग्न हो,
कल्पना में,
ढूँढता ही रह जाता है
शून्य में
प्रफुल्लता का
एक पल!
और दिन-प्रतिदिन
बढ़ता ही जाता है आकार
इस शून्य का!
और मुझे इन्तज़ार है
उस दिन का
जब लील जायेगा
मुझे ये शून्य…!
और मेरी आशाएँ-निराशाएँ
इक-दूसरे में विलीन हो
मुक्त कर देंगी मुझे
और मैं स्वछन्द हो
विचरूँगा
शून्य में ही!!

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