शुक्रवार, 17 जुलाई 2009

अमित की कविता --मेरा बचपन कहा गया ?

वो भी क्या दिन थे जब बस खिलोने टुटा करते थे ,
गिरते थे आंसू , पर दो पल को रूठा करते थे …

खिलखिला कर हंसती थी खुशियाँ ,
अलविदा कह कर भी कहाँ छूटा करते थे …

बरस के सावन हमे हंसाया करता था ,
प्यारा सा बचपन हरदम खुशिया लुटाया करता था …

पापा के कंधो पर बैठ देखते थे दुनिया ,
सारा जमाना हम पर सर झुकाया करता था ….

वोह दिन वो बचपन बहुत याद आता है ,
वोह जिंदगी फ़िर जीने को दिल ललचाता है …

सवाल तुझसे ए खुदा ! और नियति से भी ,
क्यो इतनी जल्दी एक बच्चा बड़ा हो जाता है …

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