शनिवार, 25 जुलाई 2009



खुदा के पास जाता हूं अदब से सर झुकाता हूं
भर के आंख में आंसू मैं हाले दिल सुनाता हूं

नहीं हसरत मेरी अब कुछ सिवाए मौत के अल्लाह
सफ़ीना में फंसी कश्ती नहीं दिखता कोई मल्लाह

बहारों की जो थी दुनिया बसी है अब वीरानों में
खुशी भी आज रोती है सिसकते गम के गानों में

तमन्नाओं का मेरा चांद जब आंसू बहाता है
मेरा टूटा हुआ दिल और थोड़ा टूट जाता है

जिस्म तो खाक में है मिल चुका बस रूह ज़िंदा है
यह किस्मत का हुआ मारा कटे पर का परिंदा है

चुभोए हैं मुझे नश्तर ज़माने ने बहुत चुनकर
खुदा भी आज रोएगा मेरे इस दर्द को सुनकर

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