गुरुवार, 23 जुलाई 2009

टूटने के दर्द से पूरी तरह मार देना

मेरी दोस्त ने ये एक कविता लिखी अपने एक बेवफा दोस्त के लिए

जान कर मेरी बाहों को फूलो की डाली
जब तुमने थाम ही लिया है तो
सुनो इसे छोड़ना मत
की फूल नाज़ुक है इक झटके से टूट जाएँगे
और ये डाली भी टूट जाएगी
नाज़ुक है कितनी तुम खुद जानते हो

हां जब हाथ मेरा भारी लगने लगे
तुमपे बोझ कुछ और बढ़ने लगे
या तुम्हारी राहो मैं काँटे बिछाने लगू
या मेरा बजूद तुम्हारी राह मे अड़ने लगे

तुम मेरे बदन से इक इक फूल हटाते रहना
बस जहा तक हो रब्त का बोझ उठाते रहना
ये फूल तुम्हारी ही मोहब्बत मैं तुम्हारे लिए खिले है
जहाँ ज़रूरत हो इन्हे अपने काम मॅ लाते रहना

मगर जब तुम्हारी नज़र मेरे लिए तंग हो जाए
मेरा बदन बिना फूल का कुरूप बेरंग हो जाए
जब मेरा होना तुम्हारे किसी काम का ना रहे
कोई और राह-ए-जीस्त मैं तुम्हारे संग हो जाए

अपनी सहूलत के लिए अपनी खुशी की खातिर
बेशक़ मुझे पल्ला अपना झाड़ देना
बस इतना करना की छोड़ने से पहले मुझे
टूटने के दर्द से पूरी तरह मार देना
पूरी तरह मार देना.....................

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