मंगलवार, 14 जुलाई 2009

शैतान की कहानी - अमित जैन जोक्पीडिया

एक बार शैतान का मन अपने काम से ऊब गया — सोचा, कि इस काम से सन्यास लिया जाये। उसने अपनी सारी सम्पत्ति बेचना शुरू कर दी। हाट के दिन झुण्ड के झुण्ड लोग आये और उन्हें खरीदने लगे।

नशेबाजी, चुगली, ईर्ष्या, बेईमानी, कुढन, क्रोध, जल्दबाजी, बदहवासी जैसी चीज़ें लोगों को बहुत पसन्द आयीं। उन्होंने मुँहमाँगे दाम देकर इन्हें खरीद लिया। जो न खरीद सके वे हाथ मलते रह गये।

देखते-देखते शैतान का सारा सामान बिक गया। एक चीज को उसने कपड़े से ढाँक कर रखा था क्योंकि वह उसे बेचना नहीं चाहता था। खरीददारों में से एक ने पूछा — जब सब कुछ बेचकर धन्धा छोड़ रहे हो तो इस एक चीज़ से इतना मोह क्यों? इसे भी बेचिये और निश्चिंत हो जाइये।

शैतान ने उत्तर दिया— नहीं, भाइयो! इसे मैं नहीं बेच सकता। यह मेरी सबसे प्रिय और करामाती चीज है। इसके जरिये तो मैं अपनी बेची हुई सारी चीजें वापस ले सकता हूँ। यदि सन्यास में मन नहीं लगा और फिर से मुझे अपना धन्धा शुरू करना पड़े, तो इसके सहारे अपना कारोबार फिर से शुरू कर सकता हूँ। इसको यदि बेच दिया तो मेरा अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा! न भाई न, इसे मैं नहीं बेच सकता — किसी भी कीमत पर नहीं।

लोगों के मन में उस चीज़ को देखने की उत्सुकता हुई। एक ने शैतान से कहा, नहीं बेचना तो कोई बात नहीं। परन्तु एक बार दिखा तो दो कि वह चीज़ है क्या! तब शैतान ने ऊपर से ढाँक रखे कपड़े को हटा दिया और बड़े गर्व से बोला, भाइयो! देखो, ये है आलस्य! इसके रहते मुझे वह सब कुछ मिलता रहेगा जो मैं चाहता हूँ और मेरा धंधा फिर जोर शोर से शुरू हो जायगा।

1 टिप्पणी:

  1. kahani bahoot acchi hai.kahani se bahootsi bate sikhne ko milti hai.yadi ham gahrai se soche to pata chalta hai .shaitan aj apni sari samppati logo me bechkar aram kar raha hai.ap ki soch ekdam sahi hai .wah re ajka shaitani yug. koi nahi bach paya is shaitan se.good by.

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