सोमवार, 31 अगस्त 2009

तीसरा चुटकला

संता के घर 20 साल के बाद बच्चा हुआ, उसे देख संता बहुत उदास हो गया!

बंता (संता से)- यार उदास क्यों है?

संता (बंता से)- यार ! 20 साल बाद बच्चा हुआ वो भी इतना सा?


दूसरा चुटकला

चमन (रमन से)- देखो पेपर में न्यूज आई है कि साइंटिस्ट लोग पता लगा रहे है कि कोई आदमी बिना दिमाग के कितने दिन जिंदा रह सकता है।

रमन (चमन से)- इसका जवाब तो बड़ा आसान है, तू बस उन्हें अपनी उम्र बता

एक चुटकला

चिंटू (मां से)- मां मेरी क्या कीमत है।

मां (चिंटू से)- बेटा तू तो लाखों का है।

चिंटू- तो लाखों में से 5 रुपये देना, मुझे आइसक्रीम खानी है।

प्यार में क्या चाहती है स्त्री ?

प्यार एक ऐसा खूबसूरत एहसास है, जो हर इंसान के दिल के किसी न किसी कोने में बसा होता है। इस एहसास के जागते ही कायनात में जैसे चारों ओर हजारों फूल खिल उठते हैं जिंदगी को जीने का नया बहाना मिल जाता है। स्त्री के जीवन में प्यार बहुत मायने रखता है। प्यार उसकी सांसों में फूलों की खुशबू की तरह रचा-बसा होता है, जिसे वह ताउम्र भूल नहीं पाती।

शायद जब इस संसार की रचना हुई होगी और धरती पर पहली बार आदम और हौवा ने धरती पर कदम रखा होगा, तभी से औरत ने आदमी के साथ मिलकर जिंदगी़ मुश्किलों से लडते हुए साथ मिलकर रहने की शुरुआत की होगी और वहीं से उसके जीवन में पहली बार प्यार का पहला अंकुर फूटा होगा। प्रेम एक ऐसी अबूझ पहेली है, जिसके रहस्य को जानने की कोशिश में जाने कितने प्रेमी दार्शनिक, कवि और कलाकार बन गए। एक बार प्रेम में डूबने के बाद व्यक्ति दोबारा उससे बाहर नहीं निकल पाता। स्त्रियों का प्रेम पुरुषों के लिए हमेशा से एक रहस्य रहा है। कोई स्त्री प्यार में क्या चाहती है, यह जान पाना किसी भी पुरुष के लिए बहुत मुश्किल और कई बार तो असंभव भी हो जाता है।

व्यक्तित्व की जटिलता

शायद रहस्य को ढूंढने के उधेडबुन से परेशान होकर ही किसी विद्वान पुरुष ने संस्कृत के इस श्लोक की रचना की होगी- स्त्रियश्चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं दैवो न जानाति कुतो मनुष्य:।

पुरुषों के बीच प्रचलित यह पुराना जुमला- प्रेम के मामले में औरत के ना का मतलब हां होता है, भी पुरुषों द्वारा स्त्री के व्यक्तित्व को न समझ पाने की व्यथा को ही दर्शाता है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर स्त्रियां के मन की थाह लेना पुरुषों के लिए इतना मुश्किल क्यों है? इस संबंध में मनोवैज्ञानिक डॉ. अशुम गुप्ता कहती हैं, दरअसल स्त्री का मनोविज्ञान कुछ ऐसा होता है कि वह अपनी भावनाओं का इजहार करने के प्रति अत्यधिक सचेत होती है। इसकी सबसे बडी वजह यह है कि भारतीय समाज बचपन से ही लडकियों की परवरिश इस तरह की जाती है कि वे अपने व्यवहार की छोटी-छोटी बातों को लेकर बहुत सतर्क रहती हैं। उन्हें बचपन से कम बोलना सिखाया जाता है। इस वजह से ज्यादातर लडकियां अंतर्मुखी और शर्मीली होती हैं और प्यार के मामले में भी वे स्वयं अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के बजाय वे इस बात की उम्मीद रखती हैं कि उनका ब्वॉय फ्रेंड या प्रेमी स्वयं उसकी भावनाएं समझने की कोशिश करे।

सिंथेटिक दूध के पदार्थ बेहद स्वास्थ्यवर्धक हैं

हाल में आई एक खबर बताती है कि भारत देश में शीघ्र ही दूध-दही की नदियां बहेंगी और अगर यही तरक्की बरकरार रही तो उनमें बाढ आने का अंदेशा भी हुआ करेगा। अंह.. इसे ऑपरेशन-फ्लड से नहीं जोडें। बाढ आने के इस तिलिस्म को हम बाद में खोलेंगे। और इस राज को खोलने से पहले यह भी बता दें कि हिंदुस्तान में दुग्ध उत्पादन बढने के समाचार से अकसर खुद ही सबको हैरत में डाले रखने वाला अमेरिका भी इन दिनों हैरत में है।

सुपर-कंप्यूटरों पर आधारित उसकी गणना बताती है कि भारत में पशुधन घटा है। जो दुधारू पशु शेष हैं, उन्हें भी खरामा-खरामा हरा चारा मुश्किल से नसीब होता है। अत: वे भी ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन के बूते इतना दूध तो नहीं दे सकेंगे कि दूध-उत्पादन के क्षेत्र में हम अव्वल हो जाएं। विकासशील देशों के हर मामले में टांग फंसाने वाला अमेरिका आखिार चकरघिन्नी हो गया है। उसकी समस्त गणनाएं फिस्स हो गई और दुग्ध उत्पादन के मामले में उसकी चौधराहट समाप्ति की ओर है। लिहाजा, हमारे सीने फूल-फूल कर कुप्पा हुए जा रहे हैं।

मित्रों! थाम लें अपने दिल-ओ-जिगर! क्योंकि इस भेद को अब खोला जा रहा है। हमने दूध का विकल्प विकसित कर लिया है और उसे नाम दिया है सिंथेटिक दूध। देश के नौ करोड टन के दुग्ध उत्पादन में एक करोड टन से अधिक की सक्रिय भागीदारी सिंथेटिक दूध निभा रहा है। चुनांचे, अपने मुल्क की बल्ले-बल्ले तो होगी ही। उधर, विकसित देशों के वैज्ञानिक भौंचक होंगे कि उनकी बहुत उन्नत कही जाने वाली प्रयोगशालाओं और बॉयोटेक-मिल्क बनाने की तमाम कोशिशों को धता बताते हुए हमारी ग्रामीण प्रतिभाओं ने अपने आंगनों-चौबारों में दूध का क्लोन बना लिया है। साधुवाद के पात्र हैं वे ग्रामीण शोधकर्ता, जिन्होंने इस देश को सिंथेटिक खाद्य पदार्थो के निर्माण की यह नई राह दिखाई। दोस्तों! सिंथेटिक-दूध के घटक-पदार्थ कितने सहज रूप में प्राप्त हैं? जरा नजरे इनायत करें-डिटरजेंट पाउडर, कोई सस्ता तेल, घासलेट, खडिया, यूरिया, कॉस्टिक सोडा और शक्कर। इसे किसी बडे पात्र (न हो तो नांद) में डालो। मथनी से मथो। यह लो, बिना गाय या भैंस को दुहे ही दूध हाजिर। अगर क्वालिटी और भी अच्छी बनानी हो तो तरल डिटरजेंट, सफेद रंग, ग्लूकोज, हाइड्रोजन परॉक्साइड, फॉरमिलीन और शैंपू का उपयोग करें तथा वॉशिंग मशीन में खंगाल लें। सुधीजनों! इस बात पर बहुत सारे लोग व्यर्थ ही गुस्साए हुए हैं। वे इस महान आविष्कार को विषैला बताते हुए इसके निर्माण पर पाबंदी लगाने की मांग करते हैं। एक अध्ययन बताता है कि इंसान चौथाई मिलीग्राम से अधिक जहर का सेवन तो प्रतिदिन कर ही रहा है। अगर कुछ और कर लेता है तो उसका क्या बिगड जाएगा? थोडी कठिनाई के बाद, यह भी अभ्यास में आ जाएगा। कोल्डड्रिंक्स में कीटनाशक पदार्थ होने के बावजूद लोग उसे कितने लाड से अपनाए हुए हैं? करंट बॉयो साइंस में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक ताजातरीन तरकारियों में हेवी मेटल्स यानी जिंक, तांबा, निकल, कैडमियम, सीसा, कोबाल्ट तथा घातक रसायनों की सीमा से अधिक मात्रा पाई गई है।

और, आज का आदमी क्या नहीं खा रहा? राजस्थान का राजेंद्र भाटी और तमिलनाडु का कुप्पन छिपकली को मजे से खाते हैं। मदुरै का मुरुगन तो छिपकली के अलावा सांप तथा गिरगिट को भी चबा जाता है। बीकानेर के विजयसिंह, ललौनी केपप्पू, दलपतपुर के कैलाश, झाडोली के ओटमल कंकड और ईटों को भी चबा जाते हैं। साठ साल के एंटोनिया तथा तीन वर्ष के स्टीफन साहब तो ब्लेड से लेकर कील तक आराम से हजम कर जाते हैं।

इसी तरह फ्रांस का लोलितो एक साइकिल ही चबा गया। ऑस्ट्रेलिया का लियोन सेक्सन कार भकोस गया था। एक मनचला तो छह माह में समूचा ट्रक उदरस्थ कर गया। पूना का एक नवयुवक मजे से गोबर खाता है। औरंगाबाद के प्रवीण कुमार को पिछले 18 वर्षो से आधा किलो रसोई गैस रोज पीने की लत है। कापरेन के रामदेव खेतों में छिडकने वाले कीटनाशक रसायन के दो-तीन ढक्कन मजे से हर रोज पीते हैं। बोलो, इनका बिगडा है कुछ?

सिंथेटिक दूध के पदार्थ बेहद स्वास्थ्यवर्धक हैं।

सबसे पहले इसमें पडा डिटर्जेट आपके पेट की गंदगी को धो डालेगा। यानी कब्जियत से छुटकारा। सोडा, गैस की पीडा को शांत करेगा। सफेद रंग से आंतों का चकाचक रोगन हो जाएगा। यूरिया खाद से फसल तक लहलहा जाती है। इसलिए इस फर्टिलाइजर से आपके व्यक्तित्व का भी दिन-दूनी रात चौगुनी गति से होगा अद्भुत विकास। ग्लूकोज तो वैसे ही चढाते हैं डॉक्टर लोग। आपको बोनस में ही मिल रहा है।

भगवान की इच्छा से हम भी इससे सहमत हैं। दूध में पडी चाक, खडिया, मुल्तानी मिट्टी आदि हमें वतन की जमीन से जोडे रखती हैं। इस दूध के सभी घटक स्वदेशी हैं। अत: स्वदेशी आंदोलन वालों के लिए यह ख्ाुशी का सबब है। हमने विदेशियों को दूध उत्पादन में पटकनी दे दी, देश-प्रेमियों हेतु, यह गौरव का विषय है। केवल दूध ही नहीं, बल्कि डुप्लीकेट वस्तुओं के विकासीकरण में हम अन्य मामलों में भी बहुत आगे बढे हैं। पहले शुद्ध घी में वनस्पति घी, खाद्य तेल अथवा गाय की चर्बी मिलाई जाती थी। अब सिंथेटिक का जमाना है। सफेद ग्रीस तथा अखाद्य तेल के योग से देशी घी तैयार किया जाता है। उसमें डाईएसीटिल एसिड डालकर असली घी जैसी सुगंध पैदा की जाती है। बाजरे का आटा मिलाकर घी को दानेदार भी बनाया जाता है। किसी भी प्रतिष्ठित ब्रांड के खाली डिब्बों में पैकिंग करो और बाजार में भेज दो। यह कुटीर उद्योग नगरों और कस्बों से चलकर गांवों तक में पनप गया है। अगरचे, कुछ वर्षो बाद हम निर्यात की स्थिति में आ सकते हैं।

आगरा और जयपुर से समाचार मिला है कि कुछ विकल्प विशेषज्ञों ने सिंथेटिक मावा तक बना लिया है। इसे डिब्बाबंद दूध, सूजी तथा खाद्य तेल के मिश्रण से तैयार किया जाता है।

उधर मुजफ्फरनगर के दिमागदार भी कुछ कम नहीं हैं। वे लोग कत्थे का डुप्लीकेट विकसित करने में कामयाब हो गए हैं। मृत जानवरों का सूखा रक्त, जूता-पॉलिश, मुल्तानी मिट्टी, लाल रंग और आरारोट आदि श्रेष्ठ पदार्थो के योग से कत्था तैयार होता है। इसके अनुसंधानकर्ता मुझे तो पर्यावरणप्रेमी नजर आते हैं। उनकी इस महान खोज से और चाहे कुछ हो या न हो, कम से कम खैर के पेड की ताबडतोड कटाई तो थम ही जाएगी।

सज्जनों यह हुई इंसानी खुराक की बात। अब वाहनों की खुराक यानी मोबिल ऑयल भी सिंथेटिक रूप में तैयार हो गया है। सफेद मिट्टी, ग्रीस, अरंड का तेल और रंग मिलाकर मनचाहे ब्रांड का डुप्लीकेट रूप तैयार है।

तो पाठकों विकल्पों के विकास की क्रिया के तई हम काफी आगे बढे हैं। यहां प्रत्येक प्रतिष्ठित उत्पाद का डुप्लीकेट-रूप चंद दिनों में उपलब्ध हो जाता है। सौंदर्य प्रसाधन, सॉफ्ट, वेयर्स, सीडी-कैसेट्स, करेंसी-नोट, सिक्के, पान मसाला, गुटखा, दवाएं और न जाने क्या-क्या? तथापि संभावनाएं इतनी विपुल हैं कि नित नवीन प्रकरण सामने आ रहे हैं।

लिहाजा, इसी मिजाज पर एक लतीफा पढें:

सवाल: भगवान ने इंसान को आकाश, धरती, हवा, पानी सभी चीजें बनाने के बाद ही क्यों बनाया?

जवाब : असल में भगवान को यह आशंका थी कि अगर कहीं उन्होंने इंसान को पहले बना दिया तो बाकी चीजों को तो वह स्वयं बना लेगा और भगवान को कुछ बनाने का मौका ही नहीं देगा

शनिवार, 29 अगस्त 2009

अमित की शायरी

एक अजीब सा मंजर नजर आता है ,
हर एक कतरा समंदर नजर आता है ,
कहा बनाऊ घर मै अपना शीशे का ,
हर एक हाथ मे पत्थर नजर आता है .......

बुधवार, 26 अगस्त 2009

अमित की शायरी - दोस्तों के लिए

ज़रूरत ही नही अल्फाज़ की
दोस्ती तो चीज़ है बस एहसास की
पास होते तो मंज़र ही क्या होता
दूर से ही ख़बर है हमें
आपकी हर साँस की ...........

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

डेढ़ महीने के बच्चे के पेट में बच्चा

kolkata के एक नर्सिन्ग होम के डॉक्टरों ने डेढ़ महीने के बच्चे के पेट से भ्रूण निकाला है। डेढ़ महीने का जुनैद आलम पेट की लगातार बढ़ती सूजन की वजह से ढंग से सांस भी नहीं ले पा रहा था। किसी को पता भी नहीं था कि उसकी इस परेशानी की वजह उसके पेट में पल रहा उसी का जुड़वां भ्रूण था।
चिकित्सा जगत के इस अनोखे घटनाक्रम में जुनैद के पेट से उसके जुड़वा के भ्रूण को एक सफल ऑपरेशन के बाद बाहर निकाल दिया गया। जुनैद का ऑपरेशन करने वाले सर्जन प्रफुल्ल कुमार मिश्र ने बताया कि झारखंड निवासी आलम को 21 सितंबर को नर्सिन्ग होम में भर्ती कराया गया था।

जांच के बाद उसके पेट में एक बड़े ट्यूमर का पता चला। पहले डॉक्टर को लगा कि यह कैंसर का मामला हो सकता है। जुनैद के पिता की सहमति के बाद 22 सितंबर को उसका ऑपरेशन किया गया। ऑपरेशन के दौरान ही पता चला कि वह कोई ट्यूमर नहीं, बल्कि एक अविकसित भ्रूण है। डॉक्टरों ने बताया कि भ्रूण के अंदर भ्रूण के पलने की घटना कम ही देखने को मिलती है और उनमें भी एक का ज़िंदा बच जाना तो बहुत ही आश्चर्यजनक है।

ये समाचार की कतरन आज गूगल बाबा पर भरमनकरते हुए पाई गई है
मूल स्रोत्र्र पर जाने के लिए यहाँ क्लिक करे

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

चुटकला नही है ये

क्लास में 2 लड़किया,
1 गोरी और एक1 काली.
काली गोरी से:तू कौन सी क्रीम लगाती हे?
गोरी :फेयर & लवली और तुम?
पीछे बैठा संता बोला
चैरी ब्लोसम.

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

बिल गेट्स को शिकायती पत्र लिखा है , देखो क्या नतीजा आता है

आदरणीय बिल्लू भिया को,
इंडिया से मुंगेरीलाल सरपंच का सलाम कबूल हो... आपके देश के एक और बिल्लू भिया (बतावत रहें कि प्रेसीडेंटवा रहे) ऊ भी इस पंचायत को एक ठो कम्प्यूटर दे गये हैं । अब हमरे गाँव में थोडा-बहुत हमही पढे-लिखे हैं तो कम्प्यूटर को हम घर पर ही रख लिये हैं । ई चिट्ठी हम आपको इसलिये लिख रहे हैं कि उसमें बहुत सी खराबी हैं (लगता है खराब सा कम्प्यूटर हमें पकडा़ई दिये हैं), ढेर सारी "प्राबलम" में से कुछ नीचे लिख रहे हैं, उसका उपाय बताईये -
१. जब भी हम इंटरनेट चालू करने के लिये पासवर्ड डालते हैं तो हमेशा ******** यही लिखा आता है, जबकि हमारा पासवर्ड तो "चमेली" है... बहुत अच्छी लडकी है...।
२. जब हम shut down का बटन दबाते हैं, तो कोई बटन काम नही करता है ।
३. आपने start नाम का बटन रखा है, Stop नाम का कोई बटन नही है.... रखवाईये...
४. क्या इस कम्प्यूटर में re-scooter नाम का बटन है ? आपने तो recycle बटन रखा है, जबकि हमारी सायकल तो दो महीने से खराब पडी है...
५. Run नाम के बटन दबा कर हम गाँव के बाहर तक दौड़कर आये, लेकिन कुछ नही हुआ, कृपया इसे भी चेक करवाय

हाजिर है एक चुटकला

एक मारधाड़ वाली फिल्म की शूटिंग के दौरान एक स्टंट सीन फिल्माया जाना था। हीरो के डुप्लीकेट को ऊंची खिड़की से नीचे छलांग लगानी थी। ऊंचाई ज्यादा थी इसलिये काफी कहने पर भी वह छलांग लगाने को तैयार नहीं हुआ। तब डायरेक्टर महोदय स्वयं आगे आये।

उन्होंने खिड़की से कूदकर दिखाया और सड़क पर पसरे पसरे ही कहा - ''अब समझ गये न कैसे कूदना है ? अब खिड़की पर जाओ और मेरी तरह छलांग मारो। और हां, उससे पहले जरा डॉक्टर को फोन कर दो। मेरी पसली टूट गई है।''

शनिवार, 8 अगस्त 2009

तुम्हारी याद

हर शाम भी तुम्हारी तरह क्यों
सहमी सी चली आती है,
सामने बैठी रहती है,
बिन सवाल, बिन जवाब,
और फ़िर अंधेरा छोड़कर ऐसे चली जाती है,
जैसे कभी आई ही न थी।

सजा ?

सुना है कि
तेरे शहर में बाढ़ आ गई है,
उसके इंसाफ़ पर मुझे पहले ही शक़ था,
तेरी बेवफ़ाई की सज़ा
पूरे शहर को क्यों दी गई है?

सपनो का मोल

बिन माँ के नन्हें बच्चे को
भूख से बिलखता देखकर
चित्रकार बाप चित्र उठाकर
बाज़ार चला गया,
सपने बेचकर
दूध लेता आया।

भगवान

एक दिन हारकर,
कमजोर पड़कर,
मैं तेरे घर की सीढ़ियों तक गया था भगवान,
तू सो रहा था,
मैं लौट आया।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

शायरी समझो तो समझाना

सोमवार, 3 अगस्त 2009

जब दिल से दिल मिलते है

मोहब्बत रंग लाती है
जब दिल से दिल मिलते है
मुश्किल तो ये है
दिल बड़ी मुश्किल से मिलते है

रविवार, 2 अगस्त 2009

गुस्से में है भैंस

भैंस बहुत गुस्से में है। उसका गुस्सा अपनी जगह ठीक भी है। उसकी नाराजगी गाय को माता का दर्जा प्रदान किए जाने के कारण है। गाय हमारी माता है यह बात प्रत्येक माँ अपने बच्चे को बतलाती है । इसके पीछे संभवतः यही तर्क है कि जिस प्रकार अपनी माँ के दूध को पीकर हर बच्चा हृष्ट पुष्ट तथा बड़ा होता है गाय का दूध भी यही कार्य करता है। जैसा कि सब लोग जानते हैं कि दूध का रंग सफेद होता है तथा उसकी यह विशेषता होती है कि यदि उसमें पानी मिला दिया जाए तो वह भी दूध बन जाता है। कुछ फिल्म वाले भी अपने गीतों में दूध वितरकों को पानी के गुण के बारे में यह सलाह देते रहते हैं कि उसे जिस में मिला दो लगे उस जैसा। दूध बेचने वाले प्रतिदिन यही प्रयोग करते रहते है। गाय के दूध की विशेषता यह भी है कि उससे दही, पनीर, घी, छाछ, रबड़ी इत्यादि अनेक चीजों का निर्माण होता है साथ ही गौमूत्र का भी अनेक रोगों की चिकित्सा में लाभकारी बताया गया है जिसके उपयोग की सलाह सब दूसरों को देते रहते है पर स्वयं उपयोग नहीं करते है। अनेक घरों में आज भी खाना बनाते समय सबसे पहले गाय के लिए एक रोटी बनाने की परंपरा है जिसे वे लोग अपने घर में बची खुची जूठन तथा फलों और सब्जियों छिलकों के साथ उसे परोस देते है। कुछ लोग एक दो रुपयों का चारा डाल कर अपना परलोक सुधारने में लगे है इसलिए उनको पुण्य का भागीदार बनाने के लिए बहुत सी चारे वालियाँ सड़क के किनारे डेरा जमाए रहतीं हैं यह बात और है कि यदि कोई गाय माता उनके चारे के ढेर में गलती से मुँह मार कर चारे वालियों को भी पुण्य कमाने का अवसर प्रदान कराना चाहे तो उसे स्वयं पाप का भागीदार बनना पड़ता है जिसकी परिणिति दो चार डण्डे खाने के बाद होती है।

शास्त्रों के अनुसार गाय की पूँछ पकड़ कर ही बैतरिणी पार की जाती है तथा बैकुण्ठ प्राप्त होता है किन्तु सड़कों के किनारे पुण्य कमाने की दुकानों के कारण अनेक लोग भी सड़क पर साष्टांग प्रणाम करते हुए बैकुण्ठ पहुँच जाते है। संभवतः गाय को इसीलिए माँ का दर्जा दिया गया है पर भैंस नाराज़ है। उसका कहना है कि उसके दूध से भी वही सब बनता है जो गाय के दूध से बनता है फिर क्या बात है कि गाय को तो माँ का सम्मान प्राप्त है और उसे कुछ भी नहीं ।

भैंस इस बात पर भी गुस्से का इज़हार करती है कि उसके नाम का उपयोग हिन्दी के साहित्यकारों ने कहावतों तथा मुहावरों में करके उसे बदनाम करने की साजिश रची गई है जैसे भैंस के आगे बीन बजाना में उसे ऐसा माना गया है जैसे वह बहरी हो तथा संगीत से नफ़रत करती हो यदि बीन ही बजानी हो तो साँप के आगे बजाओ भैंस के आगे बजाने की क्या आवश्यकता है। काला अक्षर भैंस बराबर में उसे अनपढ़ तथा मूर्ख समझा गया है। इसी तरह अक्ल बड़ी या भैंस में अक्ल को सब उससे बड़ा समझते है । जरा सोचिए कि अक्ल भैंस से बड़ी कैसे हो सकती हे। क्या अक्ल के अन्दर भैंस समा सकती है परन्तु भैंस के अन्दर थोड़ी बहुत तो अक्ल होती ही हे। इसी तरह गई भैंस पानी में यदि पानी में चली गई तो क्या जुल्म हो गया और तो और स्कूलों में निबंध भी गाय पर लिखने के लिए दिए जाते है भैंस पर कोई लिखने के लिए नहीं कहता।

एक फिल्मी गीत में उस के पक्ष में एक बात अवश्य फिल्म के हीरो ने उठाई है कि उसकी भैंस को डण्डा क्यूँ मारा जबकि उसका कुसूर सिर्फ इतना ही था कि वह खेत में चारा चर रही थी किसी के बाप का कुछ नहीं कर रही थी। उसके प्रति रंगभेद नीति अपनाना भी सरासर गलत है। जगह जगह गौ रक्षा समितियों का गठन तो हुआ है परन्तु भैंस रक्षा समितियाँ कहीं भी किसी ने भी नहीं बनाईं।

उसे इस बात पर भी एतराज़ है कि देवताओं ने भी उसके साथ पक्षपात किया है। अधिकांश देवताओं ने दूसरे जानवरों को अपना वाहन बनाया है जिनमें गाय, बैल, गरूण, तथा मोर और यहाँ तक कि चूहा और उल्लू तक शामिल हैं किन्तु भैंस के वंशजों को यमराज को सौंप दिया है। यदि उसे माँ के समान न समझा जाए तो कम से कम यह तो कहा जाए कि गाय हमारी माता है और भैंस हमारी मौसी है।


कथा स्रोत --गूगल