सोमवार, 31 अगस्त 2009

सिंथेटिक दूध के पदार्थ बेहद स्वास्थ्यवर्धक हैं

हाल में आई एक खबर बताती है कि भारत देश में शीघ्र ही दूध-दही की नदियां बहेंगी और अगर यही तरक्की बरकरार रही तो उनमें बाढ आने का अंदेशा भी हुआ करेगा। अंह.. इसे ऑपरेशन-फ्लड से नहीं जोडें। बाढ आने के इस तिलिस्म को हम बाद में खोलेंगे। और इस राज को खोलने से पहले यह भी बता दें कि हिंदुस्तान में दुग्ध उत्पादन बढने के समाचार से अकसर खुद ही सबको हैरत में डाले रखने वाला अमेरिका भी इन दिनों हैरत में है।

सुपर-कंप्यूटरों पर आधारित उसकी गणना बताती है कि भारत में पशुधन घटा है। जो दुधारू पशु शेष हैं, उन्हें भी खरामा-खरामा हरा चारा मुश्किल से नसीब होता है। अत: वे भी ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन के बूते इतना दूध तो नहीं दे सकेंगे कि दूध-उत्पादन के क्षेत्र में हम अव्वल हो जाएं। विकासशील देशों के हर मामले में टांग फंसाने वाला अमेरिका आखिार चकरघिन्नी हो गया है। उसकी समस्त गणनाएं फिस्स हो गई और दुग्ध उत्पादन के मामले में उसकी चौधराहट समाप्ति की ओर है। लिहाजा, हमारे सीने फूल-फूल कर कुप्पा हुए जा रहे हैं।

मित्रों! थाम लें अपने दिल-ओ-जिगर! क्योंकि इस भेद को अब खोला जा रहा है। हमने दूध का विकल्प विकसित कर लिया है और उसे नाम दिया है सिंथेटिक दूध। देश के नौ करोड टन के दुग्ध उत्पादन में एक करोड टन से अधिक की सक्रिय भागीदारी सिंथेटिक दूध निभा रहा है। चुनांचे, अपने मुल्क की बल्ले-बल्ले तो होगी ही। उधर, विकसित देशों के वैज्ञानिक भौंचक होंगे कि उनकी बहुत उन्नत कही जाने वाली प्रयोगशालाओं और बॉयोटेक-मिल्क बनाने की तमाम कोशिशों को धता बताते हुए हमारी ग्रामीण प्रतिभाओं ने अपने आंगनों-चौबारों में दूध का क्लोन बना लिया है। साधुवाद के पात्र हैं वे ग्रामीण शोधकर्ता, जिन्होंने इस देश को सिंथेटिक खाद्य पदार्थो के निर्माण की यह नई राह दिखाई। दोस्तों! सिंथेटिक-दूध के घटक-पदार्थ कितने सहज रूप में प्राप्त हैं? जरा नजरे इनायत करें-डिटरजेंट पाउडर, कोई सस्ता तेल, घासलेट, खडिया, यूरिया, कॉस्टिक सोडा और शक्कर। इसे किसी बडे पात्र (न हो तो नांद) में डालो। मथनी से मथो। यह लो, बिना गाय या भैंस को दुहे ही दूध हाजिर। अगर क्वालिटी और भी अच्छी बनानी हो तो तरल डिटरजेंट, सफेद रंग, ग्लूकोज, हाइड्रोजन परॉक्साइड, फॉरमिलीन और शैंपू का उपयोग करें तथा वॉशिंग मशीन में खंगाल लें। सुधीजनों! इस बात पर बहुत सारे लोग व्यर्थ ही गुस्साए हुए हैं। वे इस महान आविष्कार को विषैला बताते हुए इसके निर्माण पर पाबंदी लगाने की मांग करते हैं। एक अध्ययन बताता है कि इंसान चौथाई मिलीग्राम से अधिक जहर का सेवन तो प्रतिदिन कर ही रहा है। अगर कुछ और कर लेता है तो उसका क्या बिगड जाएगा? थोडी कठिनाई के बाद, यह भी अभ्यास में आ जाएगा। कोल्डड्रिंक्स में कीटनाशक पदार्थ होने के बावजूद लोग उसे कितने लाड से अपनाए हुए हैं? करंट बॉयो साइंस में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक ताजातरीन तरकारियों में हेवी मेटल्स यानी जिंक, तांबा, निकल, कैडमियम, सीसा, कोबाल्ट तथा घातक रसायनों की सीमा से अधिक मात्रा पाई गई है।

और, आज का आदमी क्या नहीं खा रहा? राजस्थान का राजेंद्र भाटी और तमिलनाडु का कुप्पन छिपकली को मजे से खाते हैं। मदुरै का मुरुगन तो छिपकली के अलावा सांप तथा गिरगिट को भी चबा जाता है। बीकानेर के विजयसिंह, ललौनी केपप्पू, दलपतपुर के कैलाश, झाडोली के ओटमल कंकड और ईटों को भी चबा जाते हैं। साठ साल के एंटोनिया तथा तीन वर्ष के स्टीफन साहब तो ब्लेड से लेकर कील तक आराम से हजम कर जाते हैं।

इसी तरह फ्रांस का लोलितो एक साइकिल ही चबा गया। ऑस्ट्रेलिया का लियोन सेक्सन कार भकोस गया था। एक मनचला तो छह माह में समूचा ट्रक उदरस्थ कर गया। पूना का एक नवयुवक मजे से गोबर खाता है। औरंगाबाद के प्रवीण कुमार को पिछले 18 वर्षो से आधा किलो रसोई गैस रोज पीने की लत है। कापरेन के रामदेव खेतों में छिडकने वाले कीटनाशक रसायन के दो-तीन ढक्कन मजे से हर रोज पीते हैं। बोलो, इनका बिगडा है कुछ?

सिंथेटिक दूध के पदार्थ बेहद स्वास्थ्यवर्धक हैं।

सबसे पहले इसमें पडा डिटर्जेट आपके पेट की गंदगी को धो डालेगा। यानी कब्जियत से छुटकारा। सोडा, गैस की पीडा को शांत करेगा। सफेद रंग से आंतों का चकाचक रोगन हो जाएगा। यूरिया खाद से फसल तक लहलहा जाती है। इसलिए इस फर्टिलाइजर से आपके व्यक्तित्व का भी दिन-दूनी रात चौगुनी गति से होगा अद्भुत विकास। ग्लूकोज तो वैसे ही चढाते हैं डॉक्टर लोग। आपको बोनस में ही मिल रहा है।

भगवान की इच्छा से हम भी इससे सहमत हैं। दूध में पडी चाक, खडिया, मुल्तानी मिट्टी आदि हमें वतन की जमीन से जोडे रखती हैं। इस दूध के सभी घटक स्वदेशी हैं। अत: स्वदेशी आंदोलन वालों के लिए यह ख्ाुशी का सबब है। हमने विदेशियों को दूध उत्पादन में पटकनी दे दी, देश-प्रेमियों हेतु, यह गौरव का विषय है। केवल दूध ही नहीं, बल्कि डुप्लीकेट वस्तुओं के विकासीकरण में हम अन्य मामलों में भी बहुत आगे बढे हैं। पहले शुद्ध घी में वनस्पति घी, खाद्य तेल अथवा गाय की चर्बी मिलाई जाती थी। अब सिंथेटिक का जमाना है। सफेद ग्रीस तथा अखाद्य तेल के योग से देशी घी तैयार किया जाता है। उसमें डाईएसीटिल एसिड डालकर असली घी जैसी सुगंध पैदा की जाती है। बाजरे का आटा मिलाकर घी को दानेदार भी बनाया जाता है। किसी भी प्रतिष्ठित ब्रांड के खाली डिब्बों में पैकिंग करो और बाजार में भेज दो। यह कुटीर उद्योग नगरों और कस्बों से चलकर गांवों तक में पनप गया है। अगरचे, कुछ वर्षो बाद हम निर्यात की स्थिति में आ सकते हैं।

आगरा और जयपुर से समाचार मिला है कि कुछ विकल्प विशेषज्ञों ने सिंथेटिक मावा तक बना लिया है। इसे डिब्बाबंद दूध, सूजी तथा खाद्य तेल के मिश्रण से तैयार किया जाता है।

उधर मुजफ्फरनगर के दिमागदार भी कुछ कम नहीं हैं। वे लोग कत्थे का डुप्लीकेट विकसित करने में कामयाब हो गए हैं। मृत जानवरों का सूखा रक्त, जूता-पॉलिश, मुल्तानी मिट्टी, लाल रंग और आरारोट आदि श्रेष्ठ पदार्थो के योग से कत्था तैयार होता है। इसके अनुसंधानकर्ता मुझे तो पर्यावरणप्रेमी नजर आते हैं। उनकी इस महान खोज से और चाहे कुछ हो या न हो, कम से कम खैर के पेड की ताबडतोड कटाई तो थम ही जाएगी।

सज्जनों यह हुई इंसानी खुराक की बात। अब वाहनों की खुराक यानी मोबिल ऑयल भी सिंथेटिक रूप में तैयार हो गया है। सफेद मिट्टी, ग्रीस, अरंड का तेल और रंग मिलाकर मनचाहे ब्रांड का डुप्लीकेट रूप तैयार है।

तो पाठकों विकल्पों के विकास की क्रिया के तई हम काफी आगे बढे हैं। यहां प्रत्येक प्रतिष्ठित उत्पाद का डुप्लीकेट-रूप चंद दिनों में उपलब्ध हो जाता है। सौंदर्य प्रसाधन, सॉफ्ट, वेयर्स, सीडी-कैसेट्स, करेंसी-नोट, सिक्के, पान मसाला, गुटखा, दवाएं और न जाने क्या-क्या? तथापि संभावनाएं इतनी विपुल हैं कि नित नवीन प्रकरण सामने आ रहे हैं।

लिहाजा, इसी मिजाज पर एक लतीफा पढें:

सवाल: भगवान ने इंसान को आकाश, धरती, हवा, पानी सभी चीजें बनाने के बाद ही क्यों बनाया?

जवाब : असल में भगवान को यह आशंका थी कि अगर कहीं उन्होंने इंसान को पहले बना दिया तो बाकी चीजों को तो वह स्वयं बना लेगा और भगवान को कुछ बनाने का मौका ही नहीं देगा

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