शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

हसी की खुराक -9

पति (पत्नी से)- मेरा फोन आये तो कहना मैं घर पर नहीं हूं।

अचानक फोन की घंटी बजी..

पत्नी ने फोन उठाकर कहा- वो अभी घर पर हैं।

पत्नी के फोन रखते ही पति खीजते हुए बोला- तुम्हें मैंने मना किया था फिर भी क्यों बताया कि मैं घर पर हूं?

पत्नी- आपने अपने फोन के लिए मना किया था, वह फोन तो मेरे लिए आया था

हसी की खुराक -8

पागलखाने का डॉक्टर अपनी पत्नी को कहता है- पागलों के साथ रह-रहकर मैं आधा पागल तो हो ही गया हूं।

पत्नी- कभी कोई काम पूरा भी कर लिया करो।

गुरुवार, 17 सितंबर 2009

हसी की खुराक -7

संता (बंता से)- यार जेल को हिंदी में हवालात क्यों कहते हैं?

बंता (संता से)- क्योंकि जेल में खाने को हवा और लात जो मिलते हैं।

हसी की खुराक -7

डॉक्टर- आपको ब्रेन ट्यूमर है।

संता- ओह, ग्रेट न्यूज

डॉक्टर- आप इतने खुश क्यों हैं?

संता- इससे ये साबित होता है कि मेरे पास ब्रेन है।

हसी की खुराक -5

एक आदमी का इंतकाल हो गया उसका दोस्त उसकी बीवी के पास आया और बोला- क्या मैं उसकी जगह ले सकता हूं?

बीवी मुझे कोई एतराज नही कब्रिस्तान वालों से पूछ लो...।

बुधवार, 16 सितंबर 2009

अब क्या करोगे?

संता की बीवी ड्राइवर के साथ भाग गई।
लोगों ने पूछा , संता जी अब क्या करोगे ?
संताः करना क्या है , अब गाड़ी खुद चलाऊंगा !!!

12 साल पुराना जूता

आप को कभी मिला ये जूता ? और मिला तो ?
की सफाई करते हुए पति-पत्नी को एक पुरानी रसीद मिली। यह रसीद उस जूते की थी जोसाल पहले मरम्मत के लिए दिया गया था लेकिन जूता वापस लाना याद ही नहीं रहा। 'चलो, जाकर मालूम करते हैं, क्या पता मिल ही जाए।'

दूसरे दिन वे दुकान में पहुंचे। रसीद दिखाई। दुकानदार ने सिर हिलाया:'... फिर भी कोशिश करताहूं,' कह कर वह दुकान के पीछे चला गया। कुछ देर बाद वह धूल से सना जूता ले आया। पति पत्नीदोनों ने एक साथ कहा: 'हम तो उम्मीद छोड़ चुके थे।'

दुकानदार बोला: 'ग्राहक की संतुष्टि ही हमारी पूंजी है। खैर, इसे अगले हफ्ते आकर ले जाइएगा।हमारा कारीगर छुट्टी पर है।'

सोमवार, 14 सितंबर 2009

हसी की खुराक -4

एक लड़के ने एक लड़की को कमल का फूल दिया।
लड़की ने उसे जोरदार तमाचा जड़ दिया।
लड़का : आपने मुझे क्यों मारा , मैं तो बीजेपी का प्रचार कर रहा था।
लड़की : और मैं कांग्रेस का प्रचार कर रही हूं।




पार्क में एक लड़का और एक लड़की बेठे हुए बात कर रहे थे !
तभी 2 कुत्ते आए और एक दूजे को किस करने लगे
लड़का : ' जानू ! क्या मै भी किस करू ? '
लड़की : ' मुझे तो कोई इनकार नही है ! कुत्ते से पूछ लो ! कहीं काट ले !' glitter graphics
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बहादुर लड़कियां नहीं, कॉलगर्ल थीं वे !

नवभारत टाईम्स मे पर्काशित ये ख़बर क्या आप का नजरिया किसी भी तरीके से बदल पाया है ?
नोएडा ।।
सेक्टर-12 मेट्रो चौराहे के पास शुक्रवार रात का एक नजारा। सड़क पर गिरे हुए एक युवक की दो लड़कियां जमकर पिटाई कर रही हैं। उसे जमकर गालियां भी दे रही हैं। यह देख लोगों की भीड़ जुट गई। खबर फैली कि दो लड़कियों ने बहादुरी दिखाते हुए चेन छीन कर भाग रहे एक स्नैचर को दबोच लिया है।

सूचना मिलते ही पुलिस भी तत्काल मौके पर पहुंची। जिस युवक की पिटाई हो रही थी उसे पुलिस ने कस्टडी में ले लिया। घटना की जानकारी के लिए दोनों युवतियों को भी थाने लाया गया। युवक से जब पुलिस ने पूछताछ की तो उसने राज खोला कि ये दोनों लड़कियां कॉलगर्ल हैं। वह बहादुरी का कोई कारनामा नहीं कर रही थीं, बल्कि तय हुई रकम की वसूली का 'प्रयास' कर रही थीं।

इनसे पूछताछ के आधार पर पुलिस ने उन दो ऑटो ड्राइवरों को भी गिरफ्तार किया जो उन्हें दिल्ली से नोएडा ले आए थे। अब पुलिस इनके पूरे रैकेट का पता लगा रही है। हालांकि इस केस में पुलिस को कोई पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं, लिहाजा इन पर अश्लील हरकत करने का आरोप लगाया है। पूछताछ में चौंकाने वाली बात आई है कि पकड़ी गई दोनों कॉलर्गल्स दिल्ली के एक कॉलेज की स्टूडेंट हैं। दोनों को शुक्रवार देर रात ही महिला थाने में भेज दिया गया।

इस मामले में पकड़ा गया युवक परसेन है। उसने अपने एक अन्य साथी से मिलकर 2-2 हजार रुपये में दिल्ली इन कॉलर्गल्स को शुक्रवार रात नोएडा बुलाया था। दिल्ली से ऑटो के जरिए नोएडा आने का खर्च भी दोनों युवकों को देना था। शुक्रवार रात दोनों कॉलगर्ल सेक्टर-12 मेट्रो चौराहे के पास पहुंची। दोनों युवक काफी देर तक उनके साथ टहलते रहे। इसे देख दोनों कॉलगर्ल ने उनसे तय हुए रुपयों की मांग की और लौटने की बात कही। इसी बात को लेकर इनमें विवाद हो गया।

मामला तूल पकड़ने पर दोनों कॉलगर्ल गाली गलौच करने लगीं। इसी दौरान एक युवक फरार हो गया, जबकि परसेन नामक युवक को सड़क पर ही दोनों कॉलगर्ल ने गिरा दिया और पिटाई शुरू कर दी। वहां मौजूद लोगों ने इस बारे में सेक्टर-24 थाने में सूचना दी कि किसी स्नैचर को दबोच कर दो लड़कियां पिटाई कर रही हैं। पुलिस भी तत्काल मौके पर पहुंची। मामले का जब खुलासा हुआ तो पुलिस ने दोनों ऑटो ड्राइवर रवि और राजू को गिरफ्तार करलिया


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रविवार, 13 सितंबर 2009

उत्तराखंड में बसा है मिनी जापान







अगर आप के पास भी ऐसी ही कोई जानकारी है तो आप मुझे मेल करे , अगली पोस्ट मे वो जानकारी सभी को दे दी जाएगीधन्यवाद amit_jain_a@yahoo.com
घनसाली, टिहरी [दीपक श्रीयाल]। शीर्षक पढ़कर आप सोच रहे होंगे कि आखिर भारत के पर्वतीय राज्य उत्तराखंड के सुदूरवर्ती अंचलों में मिनी जापान कैसे बस सकता है, लेकिन यह बिल्कुल सच है। यह सही है कि इन गांवों में एक भी जापानी नहीं रहता है। इसके बावजूद इलाके में ये गांव 'मिनी जापान' के नाम से ही जाने जाते हैं।

दरअसल इन गांवों के कमोवेश हर घर से कम से कम एक सदस्य जापान में नौकरी कर रहा है। ऐसे में जापानी मुद्रा 'येन' की बदौलत दूरस्थ होने के बावजूद आज इस गांव में कई आलीशान दो मंजिला पक्के मकान हैं। गांव में बिजली नहीं है, लेकिन हर घर में सौर ऊर्जा उपकरण लगे हैं। इनसे ग्रामीणों की रातें रोशन होती हैं।

खास बात यह है कि इस गांव के अधिकांश युवाओं का सपना भी पढ़-लिखकर जापान जाने का ही रहता है। टिहरी जनपद के भिलंगना विकास खंड का हिंदाव क्षेत्र, शिक्षा, बिजली और सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं से पूरी तरह वंचित है।

इसके बावजूद यहां के गांवों में मौजूद सुख-सुविधाएं ऐसी हैं कि बड़े-बड़े शहरों को भी मात दे दें। सड़क मार्गो से काफी दूर खड़ी चढ़ाई पार करने के बाद इन गांवों को देखकर यकीन ही नहीं होता कि ये दूरस्थ क्षेत्रों के गांव हैं। इन गांवों की समृद्धि की कहानी शुरू हुई करीब दो दशक पूर्व जब रोजगार की तलाश में यहां के कुछ युवा शहरों की ओर गए।

खास बात यह रही कि उन्होंने नौकरी के लिए सीधा जापान का रुख किया और बस गांव की तस्वीर बदलनी शुरू हो गई। आज पट्टी हिंदाव क्षेत्र के ग्राम सरपोली, पंगरियाणा, भौंणा, लैणी, अंथवालगांव आदि गांवों में लगभग हर घर से कम से कम एक सदस्य जापान मे है। इनमें से अधिकांश वहां होटल व्यवसाय से जुड़े हुए हैं।

गांव के अधिकतर लोगों का जापान में होने का असर यहां की आर्थिकी पर भी पड़ा। आज पट्टी के सभी गांवों में सीमेंट के पक्के आलीशान भवन बने हुए हैं। इनमें न केवल आधुनिक सुख-सुविधाएं हैं, बल्कि मनोरंजन के सारे साधन मौजूद हैं। खास बात यह है कि जब क्षेत्र के अधिकांश गांवों में बिजली पहुंची ही नहीं थी, तब इन गांवों के लोगों ने अपने खर्चे पर सौर ऊर्जा उपकरण लगवा लिए।

जापानी मुद्रा यानी येन की बदौलत ये गांव अन्य गांवों के मुकाबले सुविधा संपन्न हो गए। सरपोली के ग्राम प्रधान कुंदन सिंह कैंतुरा कहते हैं कि विदेश में बसे लोगों ने गांवों की तस्वीर बदल दी, लेकिन सड़क व शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं जुटाने को प्रयास किए जाने की जरूरत है।

500 विदेशी खाते हैं घनसाली स्टेट बैंक में जनपद टिहरी की भारतीय स्टेट बैंक की घनसाली शाखा में 500 बैंक खाते ऐसे हैं, जो विदेश से संचालित होते हैं। यही वजह है कि स्टेट बैंक आफ इंडिया [एसबीआई] घनसाली का सालाना टर्नओवर बैंक की अन्य शाखाओं से अधिक है। बैंक के शाखा प्रबंधक एमआर सिंह गिल बताते हैं कि सबसे अधिक खाते सरपोली गांव के लोगों के हैं। जापानी मुद्रा आने के कारण यहां गांवों की तकदीर बदली है।

सीख लिया, तो जीत लिया

किसी मनोविज्ञानी से पूछो कि वह कौन सी बात है जो कि एक व्यक्ति को सफल बना देती है, तो जवाब मिलेगा- जिसने सीखने का गुर जान लिया, वही जीत हासिल करता है। जिस किसी ने भी बडी सफलता प्राप्त की है, उसने कुछ चीजें सीखी होंगी, कुछ चीजें अपने व्यवहार में शामिल की होंगी और खुद को विकसित किया होगा। सीखने की क्षमता के बल पर ही कोई व्यक्ति सफलता हासिल करता है।

लेकिन मूल प्रश्न यह है कि आखिर लर्निग क्या है? लर्निग के बारे में कुछ भी जानने से पहले तुम खुद के बारे में सोचो। इस स्टोरी को पढने के दौरान भी तुम बहुत कुछ सीख रहे होगे। दरअसल, जिंदगी में हर पल तुम कुछ न कुछ सीखते हो। आज सुबह नींद से जगने के बाद तुमने एक खास तरीके से ड्रेसिंग की होगी। ब्रेकफास्ट किया होगा और आज के शेड्यूल के मुताबिक काम करने का संकल्प लेते हुए दिन की शुरुआत की होगी। अब यहां ध्यान देने की बात यह है कि तुमने किस तरह की ड्रेस पहनी, क्या खाया, दिन के शेड्यूल के बारे में क्या सोचा - यह सब कुछ लर्निग का ही नतीजा है। किसी ने तुम्हें कभी यह सब सिखाया ही होगा कि क्या पहनना चाहिए, क्या खाना चाहिए, किस तरह से सोचना चाहिए और अब वे चीजें तुम्हारे व्यवहार में शामिल हो चुकी हैं।

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आज दिल खुश हो गया
अब आप के लिए भी हसी की खुराक हो जाए

जीवन के मुस्किल रास्तो पे कौन आपका साथ देगा

मम्मी पापा ........ ....... नही
Brother Sister...... ......... ...नही
Friends..... ......... ......... ......नही
Husband Lover....... ......... नही नही
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सिर्फ़ or सिर्फ़ आपकी "चप्पल "

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

दिल्ली: भगदड़ में सात छात्राओं की मौत (क्या आप भी दर्द महसूस कर रहे है )

क्या आप भी इस पारकर की घटना से विचलित है ?यदि हां तो अपने मन की बात मन मे रख कर उसे जाहिर करे
नई दिल्ली [जागरण संवाददाता]। छात्रों की शर्मनाक हरकत गुरुवार को राजधानी दिल्ली में एक बड़े हादसे की वजह बन गई। स्कूल में छात्रों द्वारा धर-पकड़ और बदतमीजी से बचने के लिए छात्राओं में भगदड़ मची। भागती छात्राओं का रेला और संकरी सीढ़ी। आपाधापी-धक्कामुक्की में छात्राएं लुढ़कतीं और दबती गई। नतीजतन सात छात्राओं ने दम तोड़ दिया। 31 जख्मी हो गई। इनमें चार की हालत नाजुक है।

उत्तर-पूर्वी जिले स्थित खजूरी खास के उच्चतर माध्यमिक विद्यालय दो पालियों में चलता है। पहली पाली में छात्राएं तो दूसरी पाली में छात्र पढ़ते हैं। लेकिन परीक्षाएं साथ-साथ होती हैं। स्कूल में फ‌र्स्ट टर्म की परीक्षा चल रही है। गुरुवार को पहली पाली में सातवीं, दसवीं, ग्यारहवीं ओर 12 वीं की परीक्षा चल रही थी। लड़कियां प्रथम मंजिल स्थित कमरों में टीचर और अपने पेपर का इंतजार कर रही थीं। लड़के दूसरी बिल्डिंग में ग्राउंड फ्लोर पर थे। बारिश हो रही थी और लड़कों के कमरे में पानी भरने लगा था। इस पर स्कूल प्रशासन ने लड़कों को भी ऊपर के कमरों में जाने की घोषणा कर दी। लड़के प्रथम तल पर आ गए और उन्होंने लड़कियों के नाम पुकार कर छींटाकशी शुरू कर दी।

स्कूल की छात्राएं ज्योति व पिंकी ने बताया कि कुछ लड़कियां छेड़छाड़ से आजिज आकर सीढि़यों की ओर भागीं, लेकिन उन्हें लड़कों ने पकड़ लिया। बदतमीजी शुरू कर दी। कुछ लड़कों ने लड़कियों को क्लास रूम में ही दबोच लिया। फिर तो चारों ओर अफरातफरी मच गई। स्कूल में उस समय ढाई हजार से भी ज्यादा विद्यार्थी थे। भगदड़ ऐसी मची कि छात्राएं बचने के लिए नीचे की ओर भागने लगीं। भागती छात्राओं की संख्या अधिक थी, जबकि सीढ़ी संकरी। इसी आपाधापी में कई छात्राएं नीचे गिरीं। कोई सीढ़ी में तो कोई बरामदे में। तीन दर्जन से ज्यादा छात्राएं नीचे गिर गई और न जाने कितने लोगों ने उन्हें कुचला। जब तक शिक्षक और प्रधानाचार्य मौके पर आए, स्थिति बेकाबू हो चुकी थी। चारों ओर चीख-पुकार मची थी।

घटना की सूचना पुलिस और अन्य महकमों को दी गई। अफरातफरी के माहौल के बीच छात्राओं को गुरु तेग बहादुर एवं जगप्रवेश चंद्र अस्पताल में भर्ती कराया गया। इनमें पांच छात्राओं ललिता नागर, अफरोज, मुमताज, मोनिका और आयशा को मृत घोषित कर दिया गया। इसके अलावा 31 छात्राएं घायल हैं, जिनमें से छह की हालत गंभीर है। घटना से गुस्साए लोगों ने पुश्ता रोड पर एक चार्टर्ड बस और दमकल की गाड़ी में तोड़फोड़ की और यातायात जाम कर दिया। घटना के तुरंत बाद किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए स्कूल परिसर के आसपास भारी सुरक्षा बल तैनात कर दिया गया।

इधर, जीटीबी अस्पताल में भी परिजनों ने जमकर नारेबाजी की। मुख्यमंत्री को नारेबाजी के बीच ही अस्पताल घुसना पड़ा। अस्पताल में भारी सुरक्षा बल तैनात कर दिया गया था तथा अंदर जाने के सभी रास्ते भी बंद कर दिए गए थे। इससे मृतक व घायल छात्राओं के परिजनों को भी भारी परेशानी हुई। वे घंटों बाद अपने नौनिहालों का हाल जान पाए। मुख्यमंत्री के आदेश पर शिक्षा विभाग के दो उपनिदेशक भी अस्पताल में तैनात किए गए जिससे घायल छात्राओं व उनके परिजनों को असुविधा न हो सके।

अव्यवस्था से होते हादसे

दिल्ली के खजूरी खास में भगदड़ के दौरान छात्राओं की मौत ने एक बार फिर स्कूलों की व्यवस्था और सुविधाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस तरह के हादसे पहले भी होते रहे हैं। लेकिन सबक लेने की बात चंद दिनों-महीनों बाद बिसरा दी जाती है। अव्यवस्था और घटिया सुविधाओं के कारण हुए हादसों पर एक नजर:

-23 दिसंबर, 1995: हरियाणा के मंडी डबवाली में एक स्कूल के सालाना समारोह के दौरान आग लगने और भगदड़ में 500 से ज्यादा लोग मारे गए जिसमें अधिकांश बच्चे थे।

-16 जुलाई, 2004: तमिलनाडु के कुंबकोणम के एक स्कूल में आग लगने से 90 छात्रों की असमय मौत

-26 जनवरी, 2007: गुजरात के सूरत में आदिवासी लड़कियों के स्कूल की इमारत ढहने से 11 की मौत जबकि 40 मलबे में फंसीं

15 अगस्त, 2008: पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान स्कूल की हालिया बनी नई इमारत ढहने से 30 छात्र घायल

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बुधवार, 9 सितंबर 2009

हसी की खुराक -भाग २

बारिश के दिनों में संता छतरी लेकर बाहर गया, उसकी छतरी में बड़ा सा छेद था।

संता (बंता से)- ओए, तेरी छतरी में छेद क्यों है?

बंता- अरे, ये छेद मैंने ही किया है, ताकि बारिश बंद होने पर मुझे पता चल सके।

हसी की खुराक -1

पत्नी (पति से)- आप बहुत मोटे हो गये हो।

पति (पत्नी से)- तुम भी तो कितनी मोटी हो गयी हो।

पत्नी- मैं तो मां बनने वाली हूं।

पति- तो मैं भी तो बाप बनने वाला हूं।

रविवार, 6 सितंबर 2009

आपके कंप्यूटर के लिए जरूरी नया बटन( कुंजी )

कल ही जरूर लगवा लेना , कभी कभी जान बचने के काम आएगा

जानो -आप समलिंगी तो नही ?

अगर आप सबसे पहले गे( GAY)को नोटिस करते है ,तो मेरे पास आप के लिए एक बुरी ख़बर है ...........:)

शनिवार, 5 सितंबर 2009

मजाकिया भोलू- बच्चो के लिए -कहानी

ये कहानी कुछ बडो को भी सुनाओ , शायद उन के वयवहार मे परिवर्तन आ जाए /
भोलू
सियार की मजाक उडाने की आदत से सभी जानवर परेशान हो उठे। सभी धीरे-धीरे उससे दूर होने लगे। पर इसका भोलू पर कोई असर न था। एक दिन उसकी दोस्त रीमा ने बातों ही बातों में उसे एक कलम दिखाई। यह कलम उसे टीचर ने जन्म दिन पर उपहार में दी थी। भोलू ने कलम को देखते ही कहा-अरे, इतना घटिया पेन तुम्हें गिफ्ट में किसने दिया? रीमा ने इतना सुनते ही रोना शुरू कर दिया। पर जब उसने पेन गिफ्ट करने वाली टीचर का नाम बताया, तो भोलू सन्न रह गया। भोलू को अपनी मजाक उडाने की आदत पर बहुत पछतावा हुआ। दरअसल, वह टीचर भोलू की भी सबसे फेवरेट टीचर थीं। उसे लग रहा था जैसे कि उसने अपनी दोस्त को नहीं, बल्कि अपनी फेवरेट टीचर को हर्ट किया हो। उस दिन के बाद से उसने प्रण किया कि कुछ भी बोलने से पहले वह सोच-समझकर बोलेगा और कभी किसी का मजाक नहीं उडाएगा।

लोकतंत्र के पिता

एक छोटी सी जानकारी -
लो़क तंत्र कहा से आया ?

लगभग ईसा पूर्व सातवीं सदी में एथेंस में जबरदस्त असंतोष फैला था, क्योंकि तब वहां कोई एक व्यवस्था नहीं थी। शहर के अमीर और प्रतिष्ठित लोग अपनी मनमानी करते थे। वे समाज के पिछडे और कमजोर वर्गो की एक न चलने देते। यदि वे इस अन्याय के खिलाफ अपील भी करना चाहते, तो कहां करते। उस समय आज की तरह कोई लिखित कानून भी नहीं था। उन्हें अपने हालात से समझौता करना पडता। यानी कुल मिलाकर, वहां तानाशाही थी। लेकिन कहते हैं न, जब परेशानी आती है, तो हल भी जरूर निकल आता है। सो, इस परेशानी का हल लेकर आए सोलोन ।

सोलोन ईसापूर्व 594 का सबसे प्रतिष्ठित नाम था। वे एक कवि थे। अपने समाज की अव्यवस्था के प्रति बेहद संवेदनशील थे। समाज में एक समान व्यवस्था होगी, तभी यह अव्यवस्था खत्म हो सकती है। लेकिन एक समान व्यवस्था के लिए एक समान कानून का होना जरूरी है। सोलोन ने न केवल ऐसा सोचा, बल्कि अपने विचार को अमली जामा भी पहनाया। शहर के बीचोबीच शिलालेख लगाए गए। इन पर व्यवस्था को कैसे संचालित किया जाए, इस बाबत नियम-कानून लिखे हुए थे। एक परिषद भी स्थापित की गई। इसमें कुल चार सौ सदस्य थे। कोर्ट भी बनाया गया। जज मंडली के पास जाने से पहले एक ट्रायल जजमेंट होता था, ताकि किसी के साथ अन्याय न हो और हर किसी को न्याय मिल सके। चूंकि यह लोकतंत्र की स्थापना का शुरुआती प्रयास था। शायद इसीलिए यह पूरी तरह सफल नहीं रहा। इसके बाद कुछ समय तक एथेंस में टाइरैंट्स ने शासन किया। पर यह शासक सोलोन की व्यवस्था को आगे नहीं बढा सका। इसके बाद आए क्लेसथेंस। उन्होंने एक नई तरह की सरकार बनाई। यह सोलोन की व्यवस्था पर ही आधारित थी। इस शासक ने पांच सौ सदस्यीय परिषद बनाई। साथ ही ऑर्कन्स को भी रखा गया। ऑर्कन्स एक अधिकारी था, जो परिषद के ऑर्डर को संचालित करवाता था। इसका चुनाव वहां के आम लोग करते थे। एथेंस के नागरिक दस जनरल का भी चयन करते थे। इन जनरल में से ही किसी एक चुनाव आर्मी चीफ के रूप में होता था। इस तरह, यहां के नागरिक कह सकते थे कि वे एक ऐसे शासन में रह रहे हैं, जिसमें हर किसी का प्रतिनिधित्व है।

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

चौथा चुटकला

एक आदमी को उसका एक दोस्त रात के खाने पर आमन्त्रित करता है, जहाँ उसने ग़ौर किया कि उसका दोस्त अपनी पत्नी से कुछ कहने के बाद उसे कुछ शब्दों से सम्बोधित करता है: हनी, डार्लिंग, स्वीटहार्ट, पम्पकिन इत्यादि। वह उससे बहुत प्रभावित हुआ, क्योंकि वे दोनों 50 सालों से शादीशुदा जीवन बिता रहे थे।

जब उसके दोस्त की पत्नी किचेन में थी, उसने कहा, “मुझे लगता है कि यह कमाल की बात है कि इतने सालों के बाद भी तुम अपनी पत्नी को इतने प्यारे नामों से बुलाते हो।” उसके दोस्त ने अपना सिर झटकते हुए कहा, “तो तुम्हें सच्चाई बताता हूँ, मैं तो वास्तव में उसका नाम 10 साल पहले ही भूल चुका हूँ।”