गुरुवार, 7 जनवरी 2010

रूठी महबूबा मानाने के 151 शेर - शेर नंबर 3


मस्त नज़रों से देख लेना था
अगर तमन्ना थी आज़माने की,
हम तो बेहोश यो ही हो जाते
क्या ज़रूरत थी मुस्कुराने की.

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