गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

अमित की शायरी -3



उलफत ना सही नफ़रत ही सही

हम ये दर्द गवारा कर लेंगे

एक याद तुम्हारी दिल मे लिए

  जीने का सहारा कर लेंगे

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