बुधवार, 21 अप्रैल 2010

गीला कागज -8


गीले काग़ज़ की तरह है ज़िंदगी अपनी,
कोई लिखता भी नही कोई जलता भी नही.
इस कदर अकेले हो गये है हम आजकल,
कोई सताता भी नही कोई मानता भी नही.

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