गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

हम जिस के ना हो सके -उस की कलम से


दर्द-ए-दिल की कहानी भी वो खूब लिखता है
कहीं पर बेवफा तो कहीं मुझे महबूब लिखता है
 कुछ तो रस्म-ए-वफ़ा निभा रहा है वो
हर एक साफ-ए-कहानी मे वो मुझे मजमून लिखता है
लफ़ज़ो की जुस्तजू  मेरे संग बीते लम्हो से लेता है
सियाही मेरे अश्क को बनाकर वो हर लम्हा लिखता है
कशिश क्यों ना हो उसकी दास्तान-ए-दर्द मे यारो
जब भी ज़िक्र खुद कॅया आता है वो खुद को वफ़ा लिखता है
तहरीरें झूठ की सजाई है आज उसने अपने चेहरे पर
खुद को दर्द की मिसाल और कहीं मजबूर लिखता है वो

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