सोमवार, 26 अप्रैल 2010

वक्त की शायरी


हर खुशी है लोगों के दामन में,
पर एक हँसी के लिए वक़्त नही.
दिन रात दौड़ती दुनिया में,
ज़िंदगी के लिए ही वक़्त नही.

मया की लॉरी का एहसास तो है,
पर मया को मया कहने का वक़्त नही.
सारे रिश्तों को तो हम मार चुके,
अब उन्हे दफ़नाने का भी वक़्त नही.

सारे नाम मोबाइल में हैं,
पर दोस्ती के लाइ वक़्त नही.
गैरों की क्या बात करें,
जब अपनो के लिए ही वक़्त नही.

आँखों मे है नींद बड़ी,
पर सोने का वक़्त नही.
दिल है घामों से भरा हुआ,
पर रोने का भी वक़्त नही.

पैसों की दौड़ मे ऐसे दौड़े,
की थकने का भी वक़्त नही.
पराए एहससों की क्या कद्र करें,
जब अपने सपनो के लिए ही वक़्त नही.

तू ही बता ए ज़िंदगी,
इश्स ज़िंदगी का क्या होगा,
की हर पल मरने वालों को,
जीने के लिए भी वक़्त नही.......


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