शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

गुम होती प्‍यार की मिठास

एक समय था जब लड़का किसी लड़की को मन की मन महीनों तक प्यार करता रहता था। लेकिन उसे कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। प्यार तो प्यार ही होता है। लाख छुपाए नहीं छुपता। जिस लड़की को वह चाहता था वह लड़की भी लड़के की भावना को समझ लेती थी, लेकिन कहने से शर्माती थी। आज समय बिलकुल बदल गया है। आज दोनों के पास धैर्य की कमी होती जा रही है। दो दिन निगाहें मिली नहीं कि तीसरे दिन प्‍यार का इजहार हो जाता है । यह इजहार, इजहार न होकर अश्‍लीलता का प्रदर्शन लगता है। यह प्रेम, प्रेम से अधिक शरीर की प्‍यास बुझाने का अवसर लगता है ।
आज की युवा पीढ़ी पहली बार में ही सारे हदें पार कर जाने की सोंच के साथ प्‍यार की पींगें बढ़ाती है । पहले एक लड़का जब एक लड़की से प्यार का इजहार करता था, तो लड़की शर्माकर सिर झुका लेती थी। यदि उसे लड़के का प्यार कबूल भी होता था तो अपने दोनों हाथों की ऊंगलियों से दुपट्टे को लपेटते हुए शर्माकर चली जाती थी। लड़का बेसब्री से दूसरे दिन तक उसके जवाब का इन्तजार करता था। उस इन्तजार में जो मिठास होती थी, उसका स्वाद तो दूर अब उसका अंश भी नहीं दिखता है। करवटे बदलते हुए रात गुजारने के बाद लड़का अपनी जवाब पाने के लिए उत्सुक रहता था। लड़की आती और थोड़ी बातें करने के बाद उसके प्यार को स्वीकार कर लेती थी। फिर दोनों का गला मिलने का सुख मन की मुराद पूरी होने जैसा था। आज कालचक्र ने जिस गति से करवट लिया है, उसमें युवा पीढ़ी को पलक झपकते ही प्यार होता है। वह अपने प्यार का इजहार भी करता और लड़की उसके इजहार को इस तरह लपकती है, जैसे क्रिकेट के मैदान में बल्लेबाज के द्वारा मारे गए शॉट पर उछला गेंद हो। लड़की का प्यार पाकर लड़कों की भी मुराद पुरी होती है। लेकिन यह मुराद उसके मन की नहीं, तन की होती है। पहले जैसे अब प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर नहीं चलते, बल्कि कमर से लिपटते, बदन से चिपटते प्‍यार का भोंडा प्रदर्शन करते चलते हैं । उनका प्यार, प्यार के लिए नहीं बल्कि एक-दूसरे का शरीर भोगने के लिए होता है ।
दोनों एक-दूसरे को इस तरह से चुंबन लेते हैं जैसे मीलों पैदल चलने के बाद किसी प्यासे को पानी मिला हो। आज का प्यार और उसके इजहार का तरीका जिस तरीके से अश्‍लील होता जा रहा है, वह सोचने पर मजबूत करती है कि प्‍यार और उसकी मिठास अभी बची भी है या नहीं । शायद यही वजह है कि आजकल के प्रेम विवाह कुछ दिन बाद ही कच्‍चे धागे की तरह टूट रहे हैं । दिल्‍ली जैसे महानगर को तलाक की राजधानी कहा जाने लगा है। प्‍यार की न वह भावना है और न ही वह समर्पण... है तो बस उच्‍छृंखलता, अश्‍लीलता, वासना और एक-दूसरे को जीतने की चाह । जीत लेने के बाद यही प्‍यार फीका लगता है और रिश्‍ते टूट जाते हैं ।

आप सभी के मन में भी इस तरह कुछ न कुछ कभी न कभी आया होगा , यदि हा तो अपनी भावनाओ को अबिव्यक्त भी करे ,

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