सोमवार, 29 नवंबर 2010

तुलसीदास ने की साहित्यिक चोरी - रामचरितमानस

क्या आप जानते है की हमारे देश में ही ये संभव है की कोई सिरफिरा प्रोफेसर JNU पढ़ा रहा है ,अगर आप को विश्वाश नहीं तो ये खबर पढ़ लो 
पटना ।। अगर तुलसीदास ने रामचरित मानस आज लिखी होती तो वह साहित्यिक चोरी के मामले में जेल चले गए होते। उनकी रचना और कुछ नहीं बल्कि वाल्

मीकि रामायण की नकल है।

यह बात जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के प्रफेसर तुलसीराम ने दलित साहित्य पर आयोजित दो दिवसीय सेमिनार में कही। सेमिनार का आयोजन साहित्य अकादमी और पटना यूनिवर्सिटी हिन्दी विभाग ने संयुक्त रूप से किया है।

तुलसीराम ने कहा कि नकल होने के बावजूद तुलसीदास की रामचरित मानस काफी लोकप्रिय हुई। कट्टर हिंदू समाज ने इसे इसलिए लोकप्रिय बनाया क्योंकि इसे लिखने वाले तुलसीदास ब्राह्मण थे जबकि वाल्मीकि के दलित होने की वजह से उनकी रचना को अनदेखा कर दिया गया।
खबर  का लिंक यहाँ है

21 टिप्‍पणियां:

  1. बेव्खूफ़ प्रोफ़ेसर

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    अगर उनको ऐसा लगता है तो हो भी सकता है कि यह वजह हो...कुछ और शोध होनी चाहिये इस विचार पर... यह तो निर्विवाद सत्य है कि 'वाल्मीकि रामायण' जनमानस में रामचरितमानस के लिखे जाने के पहले उतनी लोकप्रिय नहीं थी।


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  3. हे भगवान् कैसे कैसे गधे जे एन यूं के प्रोफ़ेसर हो जाते हैं ..
    तुलसी ने नक़ल किया मगर इसकी क्रेडिट भी दी ..शुरू में ही कृतज्ञता ज्ञापित की ..
    यद रामायणे निगदितं ........और यह भी कहा है कि राम कथा का पुल तो वाल्मिकी ने बनाया ..मैं तो बस एक चींटी के मानिंद उस पर चढ़ चला हूँ ......

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  4. तुसली दास जी ने रामचरितमानस में लिखा है, जिनकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखि तिन्ह तैसी. यानि चोरों को सारे नजर आते है चोर. यूँ तो वाल्मीकि रामायण में शास्त्रों का हवाला दिया गया है और इस लिहाज से तो वाल्मीकि भी चोर हो गए. ये तो अपनी अपनी सोच है.
    वैसे भी रामचरितमानस के मंगलाचरण के सातवे श्लोक में तुलसीदास जी ने खुद ही लिख दिया है "अनेक पुराण, वेद और (तंत्र) शास्त्र से सम्मत तथा जो रामायण में वर्णित है और कुछ अन्यत्र से भी उपलब्ध श्री रघुनाथजी की कथा को तुलसीदास अपने अन्तःकरण के सुख के लिए अत्यन्त मनोहर भाषा में रचने का प्रयास कर रहा है".
    शर्म आती है प्रोफ़ेसर के नाम पर कलंक इस कलयुगी तुलसीराम की सोच पर. आजकल हर कोई "राजा" बन निकृष्ट काम करता है और "दलित कार्ड" का पत्ता खेल कर देश और देशवासी को उल्लू बना जाता है.

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    JNU के प्रोफ़ेसर का वक्तव्य जानकार , बेहद दुःख हुआ। आज के शिक्षक ही इतनी कुत्सित बुद्धि वाले होंगे तो वो विद्यार्थियों को क्या ख़ाक शिक्षा देंगे । Bhavesh ji से सहमत हूँ, " जाकी रही भावना जैसी----"

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  6. दरअसल मूर्खों के सींग नहीं हुआ करते....

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  7. Hai to sasura Tulsi Ram hi na.Tulsi das kaise ban sakta hai.

    Shayad wo ye bhul gaya ki Ramayan Snskrit Bhasha main likhi gai hai. jabki Ramcharit Manas awadhi bhasha main jo ki aaj ki aam bhasha hai. is liye Tulsidas ki Ramcharit manas hit ho gai.

    Balmiki ji ek Mahrshi the unki tulna tulsidas ji se bhi nahi kar sakte.

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  8. बेवकूफ़ एक ढूँढो हज़ार मिलते हैं शायद ऐसे ही लोगों के लिये कहा गया है……………ना खुद ज्यादा जानते तो सिखायेंगे क्या?

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  9. गनीमन है कि इन्होने ये नहीं कहा कि वर्तमान नेताओं से ज्यादा कांड तो तुलसी दास जी ने रामायण में कर डाले जैसे बालकाण्ड, लंकाकांड, सुन्दर कांड इत्यादि इत्यादि. अरविन्द जी ने सही कहा कैसे कैसे गधे प्रोफेसर बन जाते हैं.

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  10. बौद्धों ने ही संगठित वर्ण व्यवस्था का विरोध किया था। उन्होंने कहा कि आज का दलित साहित्य वर्ण, धर्म और ईश्वर का विरोध किये बगैर नहीं लिखा जा सकता।

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