गुरुवार, 17 मार्च 2011

मृत्यु की आहट-एक कविता

जब मौत की आवाज कानो मे धीरे धीरे सुनाई दे 
तब डर न जाने कहा गायब हो जाये 
एक अजीब सा जोश जिंदगी मे न जाने कहा से आ जाये 
टूटते ,बिखरते शरीर मे ना  जाने कहा से वो हिम्मत आये,
कम जो करने थे अब तक उपर वाले के सहारे ,
न जाने उन्हें करने की अपने आप ,
कहा से समझ आ जाये ,
टूटते , ठन्डे पड़ते रिश्तों को भरने  के लिए    ,
मन मस्तिस्क मे न जाने कहा से मगज आ जाये ,
क्या सब के साथ एसा होता है ?
अब तो मेरे सारे काम पुरे हो गये , 
ऐ मौत अब तू आराम से आ जा ,
काश तू पहले ये आहट दे जाती ,
तो जिंदगी मेरी पहले ही बदल जाती .........
                                                             अमित जैन

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें