गुरुवार, 14 जुलाई 2011

कितने शनिदेव

पिछले हफ्ते शिरडी जाना हुआ। हम तीन लोग थे। लौटते वक्त तय किया कि 70 किलोमीटर दूर ही शनिशिंगणापूर है, इसलिए वहां

भी हो आया जाए। यह बेहद प्रसिद्ध मंदिर है। मान्यता है कि यहां शनि की शिला प्रकट हुई थी। इस जगह के बारे में कहा जाता है कि यहां घरों में दरवाजे नहीं हैं। हम कुछ तय करते, तब तक एक कैब वाले ने आकर पूछा- शनिशिंगणापूर जाना है? बस 130 रुपये, आने-जाने का 100 रुपया। यहीं छोड़ देंगे। हमने हामी भर दी। कैब में पहले से दो परिवार थे। जैसे ही हम शिरडी से चले, हमारी मुसीबतों का सफर शुरू हो गया। कैब वाला बेहद खराब रास्ते से ले गया। गड्ढों में हिचकोले खाते हम लोगों ने 2 घंटे का सफर साढ़े तीन घंटे में पूरा किया। खराब रास्ते से जाने का कारण पूछा तो ड्राइवर ने बताया कि इन कैब्स पर बैन है।

शनिशिंगणापूर में जैसे ही कैब रुकी, एक युवक धोतियां ले आया और बोला कि इन्हें बांधकर स्नान कर लें। गीले बदन मंदिर में जाएं। हमें बताया गया कि धोती, प्रसाद, नहाने-धोने का कोई पैसा नहीं लगेगा। महिलाएं मंदिर में जा सकती हैं, प्रतिमा के पास नहीं। नहाकर जैसे ही हम गाड़ी के पास लौटे, उसी लड़के ने एक टोकरी आगे बढ़ा दी। इसमें कुछ फूल, काला कपड़ा, चांदी का दिखने वाला सिक्का, शनि यंत्र और शनि की कपड़े की प्रतिमा थी। हमसे 351 रुपये मांगे गए। हमने कम करने को कहा तो उसमें से सिक्का और शनि यंत्र हटाकर 251 रुपये मांगे। कुछ और कम करने को कहा तो जवाब मिला, यहां क्या लेने आए हो? उसकी बदतमीजी से हम सन्न थे। हमने कहा कि हमें नहीं करनी पूजा। इस पर जवाब मिला, नहीं करनी तो धोती खोल दो। हमने धोती लौटानी चाही तो हमसे नहाने के सवा दो सौ रुपये मांग लिए गए।

तब तक 10-15 लड़के वहां आ गए जो हम पर रुपये देने का दबाव बनाने लगे। एक हमारे पास आकर बड़बड़ाया - सही सलामत लौटना है तो रुपये दे दो। मैंने गाड़ी में रखा अपना फोन उठाना चाहा तो उनमें से एक ने अपना फोन आगे बढ़ा दिया और कहा- पुलिस को फोन करना है तो इससे कर ले। बाकी लोगों ने रुपये दे दिए, मैं अड़ा रहा। लग रहा था कि मैं एक लफ्ज भी और बोलूंगा तो वे हम पर अटैक कर देंगे। हमारे कपड़े, पर्स, मोबाइल सब लगभग उनके कब्जे में थे।

हालात की नजाकत समझते हुए हमने तीन लोगों के सौ रुपये दे दिए। मंदिर जाकर फटाफट गाड़ी पर लौटे और कपड़े पहने। वे लोग हर आने वाले को इसी तरह लूट रहे थे। शनिदेव की छवि जो भी हो, लेकिन मुझे वहां साक्षात कई शनि नजर आ रहे थे। दिल्ली लौटते वक्त इत्तफाक से ट्रेन में मेरी मुलाकात अकाउंटेंट गजानन गलगले से हुई जो अहमदनगर जिले के ही निवासी हैं। मुझसे यह किस्सा सुन वह आहत हुए और कहा- आपसे पहले भी यह कई लोगों से सुन चुका हूं। लोगों ने वहां जाना कम कर दिया है। थोड़े से लोग हमारे देवस्थानों को बदनाम कर रहे हैं। मैं चुप था।
ये  खबर आज नवभारत में पढ़ी थी ,पढ़ने के बाद दिल में एक टीस सी उठी , क्या आप के साथ भी यही हुआ
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