गुरुवार, 10 नवंबर 2011

गजल -2

अपना दामन देख कर घबरा गए
ख़ून के छींटे कहाँ तक आ गए
भूल थी अपनी किसी क़ातिल को हम
देवता समझे थे,धोखा खा  गए
हर क़दम पर साथ हैं रुसवाइयां
हम तो अपने आप से शरमा गए
हम चले थे उनके आँसू पोंछने
अपनी आँखों में भी आँसू आ गए
साथ उनके मेरी दुनिया भी गयी
आह वो दुनिया से मेरी क्या गए
'अमित ' कभी  हम भी जाएँ
इस जहा को  छोड़ कर
जैसे ग़ालिब ,जोक जैसे  गए
और अपनी कहानी अमर कर गये

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें