शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

दिल की बात -बेवफा सितमगर

सितम मेरे दिल पे वो यूँ ढाती  रही ,
रात भर वो बेवफा याद आता रही ,

ना हुआ  एहसास उससे किसी की तडप का,
यहाँ में शहर मे तन्हा ही चिल्लाता रहा,

सितम मेरे दिल पे वो यूँ ढाती रही …

चाहता था जिसे में खुद से भी ज़्यादा,
वो मूझे दर्द दे दे कर आज़माती रही,

लिखता रहा जिसे अपने खून से खत,
पता चला वो बिना पढ़े ही जलाती रहा,

सितम मेरे दिल पे वो यूँ ढाती रही …

“अमित ” जब उसके लौट आने की कोई उम्मीद  नही बाक़ी,
तो क्यू रात भर खुद को बहलाता रहा.

सितम मेरे दिल पे वो यूँ ढाती  रही …

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