बुधवार, 30 मई 2012

माता-पिता द्वारा बच्चियों की हत्या – बेटे की चाहत या आर्थिक विवशता



वैसे तो हम महिला सशक्तिकरण और उनके उत्थान की बातें करते नहीं थकते, लेकिन आजकल समाचार-पत्रों और न्यूज चैनलों में जो नवजात बच्चियों को उन्हीं के अभिभावकों द्वारा मौत के घाट उतारने जैसी शर्मनाक घटनाएं प्रसारित की जा रही हैं वह किसी भी व्यक्ति को भावुक कर सकती हैं और यह सोचने के लिए विवश कर सकती हैं कि हम इतने क्रूर और नृशंस समाज का हिस्सा कैसे हो सकते हैं जहां अपनी ही बच्ची को प्रताड़ना देते व मारते हुए माता-पिता एक बार भी नहीं सोचते?


बेबी आफरीन जिसे उसके पिता ने ही मार डाला, भूमि, जिसे ट्रेन में बेसहारा छोड़ते हुए उसके अभिभावकों ने एक बार भी नहीं सोचा कि अगर यह बच्ची गलत हाथों में चली गई तो इसके भविष्य का क्या होगा, सभी का कसूर बस इतना था कि वह लड़का नहीं लड़की थीं। दिल्ली, बंगलुरू, जोधपुर सहित देश के लगभग सभी बड़े शहरों का यही हाल है। हम महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार देने की चाहे जितनी भी कोशिश कर लें लेकिन वर्तमान हालातों को देखते हुए तो हम इस बात से कतई इंकार नहीं कर सकते कि माता-पिता आज भी सिर्फ लड़के की ही चाह रखते हैं। फर्क केवल इतना है कि अब वह लड़की को बोझ समझकर उसका पालन-पोषण नहीं करते बल्कि जल्द से जल्द उसकी हत्या कर उससे छुटकारा पाना चाहते हैं। अस्पताल में भर्ती माताएं यह मानने को ही तैयार नहीं होतीं कि उन्होंने बेटी को जन्म दिया है। घर पर उस नवजात बच्ची पर अमानवीय जुल्म किए जाते हैं। इतना करने के बाद भी अगर उस बेकसूर बच्ची की सांसी नहीं टूटती तो उसे जला दिया जाता है या फिर किसी नाले में फेंक दिया जाता है और कारण बताया जाता है आर्थिक परेशानी !! बच्ची के हत्यारे अभिभावक यह दलील देते हैं कि उनके पास इतनी सामर्थ्य नहीं है कि वह बेटी का पालन-पोषण कर सकें। लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि जिस तरह बेटे को बड़ा किया जा सकता है क्या उसी सोच के साथ बेटी को जीवन जीने का हक नहीं दिया जा सकता?


वहीं इन सभी घटनाओं का एक चेहरा यह भी हो सकता है कि हमारे समाज का ताना-बना ही कुछ इस तरह से बनाया गया है जहां चाह कर भी ऐसे अभिभावक जिनके आर्थिक हालात ठीक नहीं हैं, घर में एक से अधिक या कभी-कभार एक बेटी का पालन भी नहीं कर पाते। शिक्षा ग्रहण करने के बाद दूसरे के घर चले जाना और उसके ससुराल पक्ष के प्रति आजीवन ऋणी रहने जैसे हालात अभिभावकों को बेटी का बोझ उठाने नहीं देते। महिलाओं के प्रति दिनोंदिन बढ़ रही आपराधिक वारदातें भी माता-पिता की चिंता का एक बड़ा कारण हैं।


उपरोक्त चर्चा के आधार पर कुछ गंभीर सवाल उठते हैं, जिन पर विचार किया जाना नितांत आवश्यक है, जैसे:

1. क्या समय बदलने के बावजूद घर में लड़की का होना बोझ ही माना जाएगा?


2. जिस तरह एक बेटे का पालन-पोषण किया जाता है, क्या अभिभावक उसी तरह अपनी बेटी की परवाह नहीं कर सकते?


3. क्या आर्थिक हालातों का हवाला देकर एक नवजात बच्ची से उसके जीने का अधिकार छीन लेना अमानवीय नहीं है?


4. आज जब महिलाओं को भी अपनी प्रगति और उन्नति के समान अवसर उपलब्ध करवाए जा रहे हैं तो ऐसे में उनके साथ होता भेदभाव कहां तक सहन किया जा सकता है?


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