शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2012

दिल कि बात - एक सवाल dil ki baat - ek sawal

70 के दशक में आइस कैंडी बेचने वाला शख्स 5000 करोड़ का मालिक हो गया, स्कूटर पर चलने वाले ठेकेदार ने कई सौ करोड़ कमा कर अम्पायर बना लिया, पुणे में एक मामूली कारपोरेटर माँ के बेटे ने इतनी ज्ञात -अज्ञात संपत्ति हासिल कर ली की वह अकेले महाराष्ट्र का पांच साल का बजट संभल सकता है, बिहार से मुंबई गया पत्रकार एंटी बिहारी पार्टी से शुरू होकर करोड़ों का मालिक बन कहीं और शिफ्ट कर गया है ....... यह सब विदर्भ सहित महाराष्ट्र की हकीकतें हैं, ऐसी और कई कथाएँ हैं इस हकीकत में शामिल।



यह सब इतना सुनियोजित है की इसे एक्सपोज करना इतना आसान नहीं है। लेकिन केजरीवाल , चुकी जमीन की नहीं, मीडिया की राजनीति करते हैं, इसलिए उन्हें हडबडाहट थी की कच्चा -पक्का कुछ भी सही , सामने लाओ ताकि उन्हें और उनकी टीम को बी जे पी की बी टीम की छवि से मुक्ति मिले। इस प्रयास में वे जो कुछ लेकर आये, उससे जमीन पर बी जे पी को फायदा ही होना है। क्योंकि हकीकत है कि बीजेपी के लोगों ने ही विदर्भ के सिंचाई घोटाले को सामने लाया है। नीतिन गडकरी की कंपनी 'पूर्ती ' के एक डायरेक्टर माधव कोट्स्थाने ने नागपुर में एक जनहित याचिका भी दायर कर रखी है, 2011 से ही। कोट्स्थाने के द्वारा उपलब्ध कागजातों के आधार पर ही मैंने भी टाइम्स में रिपोर्टिंग की थी इस घोटाले की -2010 में. बीजेपी के लोग विधान सभा में इस मसले पर कई बार सवाल भी खड़े कर चुके हैं.

सिचाई परियोजनाओं से बड़ी कंपनियों को पानी दिए जाने के खिलाफ भी बी जे पी के लोग आवाज उठाते हैं, यह सब अक्सर स्थानीय अख़बारों में छपता रहता है। इसलिए इस आरोप से गडकरी का जमीन पर कुछ नहीं बिगड़ने वाला। गडकरी की छवि विदर्भ में बंद पड़े चीनी मील को शुरू कराने वाले नेता की है और महाराष्ट्र में नेताओं ने सहकारी संस्थाओं से ही अपनी संपत्ति अर्जित की है, वैसे में विवादित जमीन पर अपने सहकारी संस्थान से गडकरी यदि गन्ना के उन्नत सैम्पल तैयार करते हैं, तो यह आरोप भी जमीन पर गडकरी के खिलाफ बेअसर ही साबित होगा ।

केजरीवाल और उनकी पार्टी मुगालते में हैं कि बिना 'राजनीतिक दर्शन' के सिर्फ खोजी पत्रकारिता के खेल से अपनी पार्टी खड़ा कर ले जायेंगे। देखना यह है की यह मीडिया -पार्टी कब तक जीवित रह पाती है ....... प्राइम टाइम के बहसों में भी .......!!!

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