मंगलवार, 21 जनवरी 2014

शायर shayari

लिखते लिखते मन की उलझने लिख डाली
पर उलझा हुआ मन
फिर भी ना सुलझ पाया

अमित

shayarशायर १९/१/१४ (३)

अपने पराये का भेद
बचपन मे ना सीख पाए
समझा अपना सभी को
अब आके अपने भी पराए पाए
महत्वकांक्षा उनकी पैसो की
जब ना कर पाए पूरी
अपनों ने वो जुल्म ढाए
देख देख गैर भी शर्माए

अमित (दुनिया का सच देखा हमने ,जब ये जाना ,पैसो के लिए मर मिटे ,अपना हो या बेगाना

shayarशायर 19/1/14 (2)

अपनत्व की नींद से जागो मेरे भाई
कही वो अपना अपना कह के
तुझे लूट ना ले
लूट भी लिया तो कोई बात नहीं
कही रह गये खाली जेब
देख वो पहचानने मे भी नखरे करे .....

shayarशायर

अधूरा
अधूरापन
दोनों ही को जब भी मै सोचता हु
देखता हु हर रोज आईने मे ............

अमित

शायर shayr -19/1/14 (1)

मेरी मर्जी ना थी ओ तुने मेरी किस्मत मे लिखा
ओर अब मेरी किस्मत ही मेरी मर्जी हो गई

अमित

जिसने मुझे जलाया - शायरी

जिसने मुझे जलाया
वो भी ऐसे ही जायेगी
जैसी शमा भी जल जाती है
परवाने को जलाने के बाद

अमित