शनिवार, 13 सितंबर 2014

जिन्दगी से निराश क्यों हो ?

सोचना ही होगा
जब कोई आत्महत्या करता है तो हम यह मान लेते हैं कि वह जीवन से हार गया होगा इसलिए उसने आत्महत्या जैसा कदम उठाया. पर क्या कभी यह सोचा कि जरूर किसी चीज को बहुत चाहा होगा और जीवन में वो ना मिलने पर आत्महत्या की होगी या उस चीज को अपने जीवन का अंतिम लक्ष्य बनाया होगा और उस लक्ष्य की प्राप्ति ना होने पर ऐसा कदम उठाया होगा. “क्या है आत्महत्या” यह प्रश्न बड़ा गंभीर है. वास्तव में किसी व्यक्ति का अंतर्तम से स्वीकार कर लेना कि अब उसे यह जीवन नहीं जीना है और उसके जीवन का अब कोई लक्ष्य नहीं है तब व्यक्ति आत्महत्या जैसा कदम उठाता है.
मन की उलझनें आसानी से नहीं सुलझतीं
आत्महत्या करने से पहले व्यक्ति अपने मन से हजारों बार लड़ता होगा. वह कहता होगा कि ‘सोच उन रिश्तों के बारे में जो तुझे प्यार करते हैं, जो शायद तेरे इस दुनिया से जाने के बाद भी तुझे मरा हुआ नहीं मानेंगे फिर क्यों सोचता है उन लक्ष्यों के बारे में जो तेरे हुए नहीं हैं’. जरा सोचिए उस व्यक्ति की स्थिति आत्महत्या करने से पहले क्या रही होगी? उसने अपने मन से हजारों बार लड़ाई लड़ी होगी और ना जाने कितनी बार मन को समझाया होगा कि शायद आत्महत्या जैसा कदम उठाना गलत है पर फैसला नहीं ले पाया होगा.
“लड़ना होगा खुद से हजारों बार,
तभी जिन्दगी में राहें मिला करती हैं,
अगर हार गया तू तो निराश मत होना,
क्या भला एक हार से जिन्दगी रुका करती है”


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